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- वारंटी पीरिएड मे आई गाड़ी मे खराबी से अगर मुकर जाए कंपनी तो........?
Posted by : achhiduniya
24 July 2016
कई
बार ऐसे मामले सामने आते है जिससे कंजूमर को कंपनिया गुमराह करती है खासकर जब क्लेम या गारंटी की बात आती है। ऐसे ही एक मामले
में उपभोक्ता ने जब कार खरीदी वाहन पर शुरुआती वारंटी दो साल की थी। वाहन कंपनी ने
तय समय में शुल्क अदा कर वारंटी दो साल के लिए आगे बढ़वा ली। शुरुआती वारंटी दो साल
की या 75 हजार किलोमीटर की थी जो बढ़ने के
बाद चार साल या 1.5 लाख किलोमीटर के लिए हो गई। वारंटी बढ़ने की
अवधि में कार में खराबी आ गई। उपभोक्ता ने डीलर से संपर्क किया तो जांच में पता
चला कि इंजन सीज हो गया है। उसे ठीक किया गया। इसके एक हफ्ते बाद गाड़ी फिर खराब हो
गई। उपभोक्ता ने फिर डीलर से संपर्क किया। गाड़ी की मरम्मत के बाद उपभोक्ता को करीब
1.35 लाख रुपये का बिल भेजा। उपभोक्ता ने वारंटी की बात कही
तो उन्हें 65 हजार रुपये का भुगतान करने को कहा गया। उपभोक्ता
ने बीमा कंपनी ने एक सर्वेयर नियुक्त किया। सर्वेयर के अनुसार इंजन में मिट्टी
घुसने की रिपोर्ट पर कंपनी ने क्लेम से इनकार कर दिया। उपभोक्ता ने जिला फोरम में
डीलर के खिलाफ शिकायत की।
उपभोक्ता ने मुफ्त में खराबी दूर करने पांच लाख रुपये मानसिक पीड़ा के लिए और 19 हजार रुपये अन्य खर्च के लिए मांगे। यहां कंपनी ने दलील में कहा कि वारंटी अवधि में उपभोक्ता की कार की एक बार मरम्मत की जा चुकी है और उस समय 29,900 खर्चा आया था जिसे कंपनी ने उठाया। अत: दोबारा खराबी पर कंपनी जिम्मेदार नहीं है। जिला फोरम ने अपील खारिज कर दी। राज्य आयोग में भी ऐसा ही हुआ। उपभोक्ता ने राष्ट्रीय आयोग में रिवीजन याचिका डाली। आयोग ने कहा कि वारंटी बढ़ाना एक समझौता है जो उपभोक्ता वाहन कंपनी और बीमा कंपनी में हुआ है। लिहाजा वारंटी अवधि में वाहन के इंजन में खराबी आई तो इसे ठीक करना कंपनी की जिम्मेदारी है और इंजन में मिट्टी का घुसना मामूली खराबी नहीं है। अत: कंपनी छह दिन में कार ठीक करके दे और पार्किंग शुल्क के रूप में 18000 रुपये प्रतिमाह खराबी के दिन से 500 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से उपभोक्ता को भुगतान करने का आदेश दिया। मित्र डॉ. शीतल कपूर [उपभोक्ता मामलों की जानकार] की तरफ से जनहित मे जानकारी।
उपभोक्ता ने मुफ्त में खराबी दूर करने पांच लाख रुपये मानसिक पीड़ा के लिए और 19 हजार रुपये अन्य खर्च के लिए मांगे। यहां कंपनी ने दलील में कहा कि वारंटी अवधि में उपभोक्ता की कार की एक बार मरम्मत की जा चुकी है और उस समय 29,900 खर्चा आया था जिसे कंपनी ने उठाया। अत: दोबारा खराबी पर कंपनी जिम्मेदार नहीं है। जिला फोरम ने अपील खारिज कर दी। राज्य आयोग में भी ऐसा ही हुआ। उपभोक्ता ने राष्ट्रीय आयोग में रिवीजन याचिका डाली। आयोग ने कहा कि वारंटी बढ़ाना एक समझौता है जो उपभोक्ता वाहन कंपनी और बीमा कंपनी में हुआ है। लिहाजा वारंटी अवधि में वाहन के इंजन में खराबी आई तो इसे ठीक करना कंपनी की जिम्मेदारी है और इंजन में मिट्टी का घुसना मामूली खराबी नहीं है। अत: कंपनी छह दिन में कार ठीक करके दे और पार्किंग शुल्क के रूप में 18000 रुपये प्रतिमाह खराबी के दिन से 500 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से उपभोक्ता को भुगतान करने का आदेश दिया। मित्र डॉ. शीतल कपूर [उपभोक्ता मामलों की जानकार] की तरफ से जनहित मे जानकारी।

