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- सरकार की रोजगार योजना मुहिम में जुड़ने के बजाय भीख मांगकर ज्यादा मुनाफे में खुश हैं भिखारी....
Posted by : achhiduniya
03 July 2019
भिखारियों को अभी बड़े चौराहे पर गाड़ी सफाई और शीशा साफ करने
पर जो आय होती है, वह कूड़ा कलेक्शन से हो पाना संभव नहीं है।
बड़े-बड़े रेस्टोरेंटों और मंदिरों के बाहर किसी विशेष अवसर पर उन्हें ज्यादा
मुनाफा होता है। ऐसे में नगर आयुक्त ने कहा कि यह बदलाव करना आसान नहीं है पर कोशिश
करने में क्या हर्ज है! इसको सभी अधिकारी अभियान के रूप लेंगे तो निश्चित तौर पर
सफलता मिलेगी। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नगर निगम अब भीख मांगने वाले
लोगों को रोजगार से जोड़ने की मुहिम चलाने जा रही है, ताकि उनकी आय सुनिश्चित हो सके और जीवन स्तर सुधरे।
मगर भिखारी काम में लगने को तैयार नहीं हैं, उन्हें अपना
मौजूदा हाल ही पसंद है। हजरतगंज चौराहे पर लगभग 20 साल से
भिक्षावृत्ति में लगे एक भिखारी ने बताया कि इस धंधे में वह लगभग पांच साल से है।
यहां कमाई ठीक-ठाक हो जाती है। हालांकि उसने यह बताने से मना कर दिया कि किसके लिए
काम करता है। उसने कहा,हम लोगों के हफ्तेवार चौराहे बंधे होते
हैं। किसी एक जगह पर टिकना मना है। मुझे यही ठीक लगता है, मैं किसी और काम में जाना नहीं चाहता हूं। नगर
निगम की योजना के बारे में बताने पर उसने कहा, हम कूड़ा
कलेक्शन से कितना पा जाएंगे? यहां पर
बैठे-बैठे भरपेट भोजन भी मिलता है। हम
शेल्टर हाउस में एक दो बार जा चुके हैं,लेकिन वहां पर
काम ज्यादा है। भूखे भी रहना पड़ता है।
इससे ठीक यही है।
भिखारियों के जीवन पर काम करने वाले एक पत्रकार के अनुसार
भिक्षावृत्ति से जुड़े लोगों का एक सेंडिकेट चलता है। हर दिन और घंटे में बदल-बदल
कर ये लोग मंदिरों और चौराहों पर बैठते हैं। ये अपने जीवन से खुश रहते हैं। अगर
बदलाव की कोई बात करो तो मना कर देते हैं। उन्होंने कहा,हमने तो पूरी छानबीन भी की है। किसी-किसी भिखारी
के पास रेलवे और बस के पास भी मिले हैं। वे अन्य जिलों से हर सप्ताह आकर यहां पर
भिक्षा मांगते और पैसा लेकर निकल जाते हैं। इनके पीछे कौन सा गिरोह काम कर रहा है, यह तो ठीक से पता नहीं चल पाया है, लेकिन एक बात तो है कि इसमें जुड़े लोग बड़े स्तर
के माफिया और सेंडिकेट हैं, जो व्यापार के नाम पर ऐसा धंधा कर रहे हैं।
भिक्षावृत्ति की समस्या के समाधान के लिए पहले भी कई बार सरकारी और निजी स्तर पर
अनेक प्रयास किए जा चुके हैं।
प्रशासनिक स्तर पर इस बारे में सख्ती से कदम उठाने
के निर्णय भी लिए गए हैं, लेकिन अब तक प्रदेश में इस समस्या का कोई
स्थायी समाधान खोजा ही नहीं जा सका है। भिक्षावृत्ति से जुड़े जितने भी लोग हैं, उन्होंने अपना स्थानीय पता देने से हालांकि मना
कर दिया। वे किसके लिए यह धंधा करते हैं, यह भी बताने
से कतराते हैं। भिक्षावृत्ति से जुड़े लोगों को और उनका जीवन संवारने वाले बदलाव
संस्था के मुखिया शरद पटेल का कहना है कि लखनऊ में लगभग 4500 वयस्क भिक्षावृत्ति से जुड़े लोग हैं। शरद व उनके
साथियों ने 2014 में भिखारी पुनर्वास अभियान शुरू किया।
उन्होंने बताया,जब मैंने यह काम शुरू किया तो देखा यहां पर
9 बेगर होम बने हैं। यहां कर्मचारी तो है, लेकिन भिखारी नहीं है। समाज कल्याण के लोग इसे
संचालित करते हैं।
इसमें जो पुलिस के माध्यम से लोग पकड़े जाते हैं और उसे एक साल
बाद बॉण्ड भरवाकर उन्हें छोड़ देते हैं। इससे कोई लाभ नहीं है। शरद ने बताया कि
इन्हें काम से जोड़ना अच्छा मुहिम है, लेकिन जबरन यह
जोड़ना ठीक नहीं है। दरअसल, इस पेशे में जुड़े लोग धीरे-धीरे नशा और
अन्य चीजों की आदी हो जाते हैं। फिर वह इस धंधे से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। इन
लोगों को बिना काम किए इतना पैसा मिलता है कि उन्हें अन्य काम में मन नहीं लगाता
है। इन्हें जागरुक करने की जरूरत है।




