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बीते वर्षो की राजनीति में कांग्रेस को समर्थन दे चुकी शिवसेना की एनसीपी प्रमुख से मुलाक़ात क्या लाएगी महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल...?
Posted by : achhiduniya
01 November 2019
बीजेपी से 50-50 के फॉर्मूले पर अड़ी शिवसेना ने विधायक दल की बैठक में एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुना। क्योंकि उद्धव ठाकरे पहले भी तय कर चुके हैं कि शिवसेना की ओर से मुख्यमंत्री आदित्य ठाकरे ही होंगे,लेकिन संजय राउत की शरद पवार से मुलाकात के बाद शिवसेना का रुख और सख्त हो गया है। आज सुबह संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ सरकार बनाने को लेकर कोई बातचीत नहीं हो रही है और इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में अगला मुख्यमंत्री शिवसेना की होगा। तो क्या शिवसेना एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने को तैयार है? लेकिन इसके लिए क्या शिवसेना को कांग्रेस का भी समर्थन लेने को राजी हो जाएगी? इसके लिए हमें बीते राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी नजर डालनी पड़ेगी। कांग्रेस और शिवसेना में भले ही गहरे वैचारिक मतभेद रहे हों लेकिन मौका पड़ने पर दोनों दल एक साथ आ चुके हैं।
साल 2007 में
हुए राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने कांग्रेस की प्रत्याशी प्रतिभा पाटिल का
समर्थन किया था। इसके बाद साल 2012 के राष्ट्रपति चुनाव कांग्रेस
के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को भी शिवसेना का समर्थन मिला। साल 2018 में शिवसेना के मुखपत्र सामना में संजय राउत ने लिखा कि सिर्फ आपातकाल के फैसले के लेकर इंदिरा गांधी के योगदान को भुलाया नहीं जा
सकता है। राउत आगे लिखा कि इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र समर्थक थीं और आपातकाल के बाद
उन्होंने चुनाव भी कराए और हार गईं। इससे पहले आपातकाल के तुरंत बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान बाला साहेब ठाकरे और उनका संगठन
शिवसेना इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले कांग्रेस के समर्थन में रहे। इसके बाद 1980 के चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेस का ही साथ दिया। इन दोनों
लोकसभा चुनाव में शिवसेना खुद चुनाव में उतरी ही नहीं थी।

