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- खबरदार सरकार के खिलाफ कुछ बोले तो...?
Posted by : achhiduniya
16 May 2021
भारत एक लोकतांत्रिक देश है,लेकिन
लोक तंत्र न जाने कहां लुप्त हो गया है। पुछने-कहने के अधिकारो को मानो कैद कर
लिया गया। ऐसा लगता है फ़्रीडम ऑफ स्पीच के मुंह पर टेप जड़ दी गई हो कुछ बोलने से
पहले आपको यह सोचना जरूरी हो गया है की आप जो बोल रहे है वह सरकार के खिलाफ तो नही
चाहे आप सही बोल रहें है या सरकार से सवाल पूछ रहें है जो आपका संवैधानिक अधिकार
है,लेकिन इससे कोई फर्क नही पड़ता किन्तु वह सरकार के विरुद्ध ना हो पश्चिम बंगाल हो, कश्मीर का मुद्दा हो, किसानों के कानून हों, जजों की नियुक्ति हो,लॉकडाउन हो, नोटबंदी हो, जीएसटी हो, सरकार के महर्षियों ने एक बार कह दिया तो कह दिया। अब तीर वापस नहीं आएगा। कोविड के दिनों में तय था कि वैक्सीन बनी तो देश को 80 करोड़ डोज चाहिए होंगी पर नरेंद्र मोदी को नाम कमाना था। लाखों डोज भारतीयों को न दे कर 150 देशों में भेज दी गईं जिन में से 82 देशों को तो मुफ्त दी गई हैं। भारत में लोग मर रहे हैं, वैक्सीन एक आस है पर फैसला ले लिया तो ले लिया। यह हर मामले में हो रहा है। पैट्रोल, डीजल,
घरेलू गैस के दाम बढ़ रहे हैं तो कोई सुन नहीं रहा। चुनाव तो हिंदू-मुस्लिम कर के जीत लिए जाएंगे नहीं जीते तो विधायकों को खरीद लेंगे जैसे कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश में किया। जनता की न सुनना हमारे धर्मग्रंथों में साफ साफ लिखा है। राजा सिर्फ गुरुओं की सुनेगा चाहे इस की वजह से सीता का परित्याग हो, शंबूक का वध हो, एकलव्य का अंगूठा काटना हो। जनता बीच में कहीं नहीं आती। यह पाठ असल में हमारे प्रवचन करने वाले शहरों में ही नहीं गांवों में भी इतनी बार दोहराते हैं कि लोग समझते हैं कि
राज करने का यही सही तरीका है। भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी ऐसे ही राज करती रही है, ममता बनर्जी भी ऐसे ही करती हैं, उद्धव ठाकरे भी। यह हमारी रगरग में बस गया है कि किसी की न सुनो। हमारा हर नेता, हर अफसर अपने क्षेत्र में अपनी चलाता है चाहे सही हो या गलत। यह तो पक्का है कि जब 10 फैसले लोगे तो 5 सही ही होंगे पर 5 जो खराब हैं, गलत हैं, दुखदायी हैं, जनता को पसंद नहीं हैं तो दुर्वासा मुनि की तरह जम कर बैठ जाने का क्या मतलब? आज सरकार लोकतंत्र की देन है, संविधान की देन है, पुराणों की नहीं। पौराणिक सोच हमें नीचे और पीछे खींच रही है। हर जना आज परेशान है। आज धन्ना सेठों को
छोड़ कर हर किसान, मजदूर, व्यापारी परेशान है पर वह भी यही सोचता है कि राजा का फैसला तो मानना ही होगा। उस के गले से आवाज नहीं निकलती। यह सोच हर गरीब को ले डूबेगी। गरीब हजारों सालों से गरीब रहा क्योंकि वह बोला नहीं। उस ने पढ़ा नहीं, समझा नहीं, जाना नहीं। इंदिरा गांधी ने इस का फायदा उठाया। आज मोदी उठा रहे हैं। जिस अच्छे दिन की उम्मीद लगा रखी थी वह आएगा तो तब जब अच्छा होता क्या है यह कहने का हक होगा और सुनने वाला सुनेगा।




