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- राजनीत में सत्ता के लिए चाचा-भतीजे की लड़ाई नई नही...
Posted by : achhiduniya
17 June 2021
उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जीत मिली तो दल के मुखिया मुलायम सिंह यादव के सामने बेटे अखिलेश यादव और भाई शिवपाल सिंह यादव के रूप
में दो मजबूत विकल्प थे। शिवपाल का राजनीतिक करियर और अनुभव अखिलेश के मुकाबले
कहीं ज्यादा था, लेकिन बाजी बेटे के हाथ लगी। 2007 में बसपा की सरकार के दौरान शिवपाल नेता प्रतिपक्ष भी थे। युवा
चेहरे और चुनाव में जमकर पसीना बहाने वाले अखिलेश यादव राज्य के सबसे युवा
मुख्यमंत्री बने और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। मगर युवा भतीजे के अधीन
अनुभवी चाचा के बीच शीत युद्ध धीरे-धीरे सतह पर आ गया। झगड़ा शांत कराने के लिए
मुलायम ने शिवपाल को 2016 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो
अखिलेश ने शिवपाल से पीडब्ल्यूडी, राजस्व और सिंचाई जैसे अहम
विभाग छीन लिए। दो दिन बाद शिवपाल ने मंत्री पद से उनके बेटे आदित्य ने कोऑपरेटिव फेडरेशन ने भी त्यागपत्र दे दिया।
महाराष्ट्र की राजनीति में भी चाचा-भतीजे के तौर पर
शरद पवार और उनके भाई के बेटे अजित पवार के बीच भी काफी उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते रहे। अजित पवार को
राजनीति में लाने का श्रेय उनके चाचा और एनसीपी के प्रमुख शरद पवार को जाता है, लेकिन
कथित सिंचाई घोटाले को लेकर वो अपने चाचा
के लिए मुसीबत बने। अजित पवार के महज 27 साल के बेटे पार्थ पवार के मावल लोकसभा सीट से मई 2019 में चुनाव हारने पर भी दोनों में
मनमुटाव रहा। फिर नवंबर 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे जब किसी पार्टी के पक्ष में नहीं आए तो अजित पवार ने
अपने चाचा को भरोसे में लिए बिना पार्टी के कुछ विधायकों के साथ बीजेपी (BJP) से हाथ मिला लिया। एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के गठबंधन की सुगबुगाहट के बीच 23 नवंबर 2019 की सुबह 5.30 बजे
देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने डिप्टी सीएम की शपथ ली,लेकिन कुशल रणनीतिकार शरद पवार ने अजित पर कार्रवाई की बजाय
उन्हें सूझबूझ से पाले में लाने में सफल रहे। हालांकि शरद पवार के बाद उनकी बेटी सुप्रिया
सुले
या अजित में कौन पार्टी की कमान संभालेगा, यह सवाल अभी भी बाकी है। बिहार के क्षेत्रीय दल लोक जनशक्ति पार्टी में दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान की विरासत को
लेकर उनके बेटे चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस में उठापटक चल रही है। एलजेपी के 6 सांसदों में से 5 सांसदों ने
पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में बगावत कर दी। चिराग पासवान को हटाकर कर चाचा पशुपति पारस लोकसभा में संसदीय दल के नेता बन गए। भतीजे ने भी जवाब देते हुए
चाचा समेत सभी बागी सांसदों को पार्टी से ही निकाल दिया। सुलह-समझौते के आसार खत्म
होने के साथ अब राजनीतिक उत्तराधिकार की यह जंग लंबी चलने वाली है। दोनों पक्ष
कानूनी विशेषज्ञों की राय ले रहे हैं और मामला कोर्ट से लेकर चुनाव आय़ोग की चौखट
तक भी जा सकता है। एलजेपी में
चिराग के चचेरे भाई प्रिंस राज बिहार इकाई के अध्यक्ष और राम विलास के एक और भाई
रामचंद्र पासवान समस्तीपुर से सांसद थे। रामचंद्र का जुलाई 2019 में निधन हो गया
था। दोनों ही नेता अब खुद को एलजेपी का मुखिया बता रहे हैं और समर्थकों के बीच भी
इसको लेकर टकराव दिख रहा है।



