Posted by : achhiduniya 09 August 2023

बड़ती आबादी के चलते गगन चुम्बी इमारतों से आज शहर पटे पड़े है,इन आसमान छूती बिल्डिंगों में 20 से 40 मंजिल अब आम हो चली हैं। इन आसमान छूती बिल्डिंग के फ्लैटों में आने जाने का एक मात्र जरिया लिफ्ट होती हैं,लेकिन कम रखरखाव के कारण ये लिफ्ट आज लगभग हर शहर में दुर्दशा की शिकार हैं। आए दिन किसी न किसी शहर से लिफ्ट टूटकर गिरने, लिफ्ट अटकने, लिफ्ट में लोगों के फंस जाने या अन्य किसी प्रकार की दुर्घटना से जुड़ी खबर आ ही जाती है। शहर चाहें कोई भी हो, लिफ्ट से होने वाली दुर्घटनाओं में लोगों के घायल होने या फिर जान गंवाने की खबरें अब आम हो चुकी हैं। लिफ्ट की दुर्घटनाओं में जो कारण आमतौर पर सामने आता 
है,वह है मेंटेनेंस की कमी। बिल्डिंग के 3 से 5 साल पुराना होते ही लिफ्ट से जुड़ी समस्याएं आने लगती हैं। शहरों में ऊंचे अपार्टमेंट में रहने वाले लाखों लोग जिन लिफ्ट पर निर्भर है, उनकी बदतर स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है, आम लोग इसके लिए क्या सरकार से मदद की गुहार लगा सकते हैं और यदि काई दुर्घटना हो जाती है तो इसके लिए कौन दोषी होगा। भारत में अपार्टमेंट के निर्माण और इसके रखरखाव के लिए खास कानून है। इसके साथ ही विभिन्न राज्य भी इमारतों के रखरखाव के लिए कानून बनाते हैं।


भारत में में 2016 में लागू हुए नेशनल बिल्डिंग कोड (एनबीसी) में इस बारे में सख्त प्रावधान किए गए हैं। इस कानून में एलिवेटर के लिए ट्रैफिक एनालिसिस कैलकुलेशन के लिए दिशानिर्देश दिए गए हैं, जिसमें हैंडलिंग कैपेसिटी और रेस्पॉन्स टाइम के बारे में बताया गया है। अपार्टमेंट में एलिवेटर के लिए पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) द्वारा लाइसेंस दिया जाता है। अधिकांश राज्यों में एक लिफ्ट निरीक्षक होता है जिसके पास लिफ्ट की स्थापना और लिफ्ट के संचालन की अनुमति देने का अधिकार होता है। यह विभाग लिफ्ट अनुपालन को लागू करने के लिए PWD लिफ्ट अधिनियम का उपयोग करता है। इन सबके बीच, मुंबई लिफ्ट अधिनियम सबसे पुराना और सबसे विस्तृत है और अधिकांश अन्य राज्य कुछ संशोधनों के साथ इसी अधिनियम का पालन करते हैं। 





नियम के अनुसार पीडब्ल्यूडी द्वारा लिफ्टों का वार्षिक निरीक्षण किया जाता है। अपार्टमेंट के बिल्डिर या​ फिर वहां की रेजिडेंट एसोसिएशन को पीडब्ल्यूडी से लाइसेंस लेना होता है और हर साल इसका नवीनीकरण करना होता है। सभी एलिवेटर कंपनियों को अपार्टमेंट लिफ्टों को स्थापित करने और बनाए रखने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है ताकि वे पीडब्ल्यूडी मानदंडों और आईएस मानकों का पालन किया जाए। आज की स्थिति में, लिफ्ट लाइसेंस सिर्फ महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली सहित दस राज्यों में जरूरी है। भारत के लोक निर्माण विभाग ने लिफ्ट की उम्र को लेकर खास नियम तय किए हैं।

नियम के अनुसार एक लिफ्ट का सामान्य जीवन लगभग 15 वर्ष से 20 वर्ष होता है। बेहतर रखरखाव के साथ इसकी उम्र को 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि, यह उम्र एलिवेटर के निर्माण, उसके उपयोग, ग्राहक प्रबंधन, रखरखाव और यातायात पैटर्न जैसे कारकों पर निर्भर करता है। कानून के मुताबिक 15 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाली इमारतों के लिए आठ-यात्री फायर लिफ्ट की जरूरत होती है इसमें ऑटोमैटिक दरवाजे हों और 60 सेकंड में बिल्डिंग के टॉप फ्लोर तक पहुंच जाए। एनबीसी 2016 के मुताबिक 30 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाली इमारतों में स्ट्रेचर लिफ्ट की जरूरत है। किसी भी अन्य उत्पाद की तरह, लिफ्ट के निर्माता अपने उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं।


यहां तक कि निर्माता की वारंटी की अवधि से परे भी इसमें आने वाली खामी के लिए कंपनी जिम्मेदार होती है। इसे उत्पाद दायित्व कानून के रूप में जाना जाता है, जो विनिर्माण प्रक्रिया में शामिल कई पक्षों पर लागू हो सकता है। हालाँकि, यह केवल एलिवेटर के निर्माता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें डिज़ाइन और इंजीनियरिंग फर्म, कंपोनेंट निर्माता, विक्रेता, और एलिवेटर की पहली शुरुआत और इसकी अंतिम स्थापना के बीच शामिल परिवहन कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं। लिफ्ट का रखरखाव एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन यदि अपर्याप्त रखरखाव के कारण दोषपूर्ण मरम्मत के कारण लिफ्ट दुर्घटना की शिकार हो जाती है। 
यह संभव है कि मरम्मत या रखरखाव से जुड़ी कंपनी को किसी भी क्षति के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा। लिफ्ट की रखरखाव के लिए जिम्मेदार कंपनी यदि कोताही बरतती है तो उस पर कानूनन जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।  बिल्डिंग की लिफ्ट बिल्डर कंपनी लगवाती है, लेकिन कुछ सालों में मेंटेनेंस अपार्टमेंट एसोसिएशन के हाथ आ जाता है। रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी रेजिडेंशियल एसोसिएशन की हो जाती है। भवन मालिक यह देखने के लिए ज़िम्मेदार है। 
 

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