- Back to Home »
- Discussion , National News »
- आज भी आम नागरिक है न्याय से वंचित 5 करोड़ से ज्यादा मामले है लंबित…..
Posted by : achhiduniya
16 December 2023
देश
की सरकार के अनुसार, अदालतों में मामले के निपटान
के लिए पुलिस, वकील, जांच
एजेंसियां और गवाह किसी भी मामले में अहम किरदार निभाते हैं,लेकिन
इन्हीं लोगों द्वारा यदि कई कार्यों में देरी की जाती है जो परिणामों तक पहुंचने
में समय लगा देती है। वर्तमान में अदालतों में वकीलों की गैरहाजिरी की वजह से मामलों
की सुनवाई नहीं हो पाती है। कानून मंत्री के अनुसार,अदालतों
में लंबित मामलों का निपटारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में है। अदालतों में
मामलों के निपटारे में सरकार की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। देशभर की अदालतें
लंबित मामलों की संख्या से लगातार बढ़ोतरी हो रही हैं। अब हाल ही में संसद में ये
मुद्दा उठा, जहां शीतकालीन सत्र के दौरान
कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने लोकसभा में बताया कि देश की अदालतों में फिलहाल 5 करोड़
से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। सिर्फ
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 80 हजार
है। संसद में एक सवाल के जवाब में मेघवाल ने बताया कि 1 दिसंबर
तक अदालतों में 5,08,85,856 मामले लंबित हैं। इनमें से 61 लाख
से ज्यादा मामले उच्च न्यायालयों के स्तर पर हैं। वहीं जिला और अधीनस्थ अदालतों
में लंबित मामलों की संख्या 4.46 करोड़ से ज्यादा है।
इससे
पहले कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने मानसून सत्र के दौरान भी एक सवाल के जवाब
में लंबित मामलों की संख्या बताई थी। जिसमें उन्होंने लंबित मामलों की संख्या 5.2 करोड़
बताते हुए कहा था,इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट
सिस्टम (आईसीएमआईएस) से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 1 जुलाई
तक सुप्रीम कोर्ट में 69,766 मामले लंबित हैं। नेशनल
ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) पर मौजूद जानकारी के मुताबिक 14 जुलाई
तक हाई कोर्ट में 60,62,953 और जिला और अधीनस्थ अदालतों
में 4,41,35,357 मामले लंबित हैं। वहीं संसद
के शीतकालीन सत्र में लंबित मामलों की संख्या 5,08,85,856 बताई गई है। जाहिर है लंबित मामलों में लगातार इजाफा होता
जा रहा है।
अदालतों में जजों की कमी लंबित मामलों की बढ़ती
संख्या में एक बड़ी वजह है। सरकार द्वारा दिए जवाब के अनुसार, भारतीय
न्यायालयों में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 26,568 जजों
की है, जिनमें से सुप्रीम कोर्ट में
जजों की स्वीकृत संख्या 34 तो वहीं हाई कोर्ट में जजों
की स्वीकृत संख्या 1,114 है। इसके अलावा जिला एवं
अधीनस्थ अदालतों में जजों की स्वीकृत संख्या 25,420 है।
हालांकि कुल जजों की संख्या में से 324 पद अभी खाली हैं और उन पर
जजों की नियुक्ति नहीं हुई है। राज्यसभा में विधि द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार
भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 21 जज
ही हैं। ऐसे में जजों की कमी लंबित मामलों का एक बड़ा कारण बनकर सामने आती है।
भारत में न्यायाधीश जनसंख्या अनुपात भी दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है। ऐसे
में अदालत में लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए अधिक न्यायाधीशों की जरूरत है।
इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को आधिकारिक एवं गैर-आधिकारिक
समारोहों (जैसे सम्मेलन, सेमिनार, उद्घाटन
आदि) में भी जाना पड़ता है, जिसमें उनका बहुत समय बर्बाद
हो जाता है और इसका असर मामलों की सुनवाई में भी पड़ता है। जजों की कमी के अलावा
देश की अदालतों में चल रहे केसों के लंबित होने का कारण अदालत के कर्मचारियों और
कोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, साक्ष्यों का न जुटाया जाना, जांच
एजेंसियों, गवाहों और वादियों जैसे
हितधारकों के सहयोग में कमी भी शामिल है।
मामलों के निपटान में देरी की एक वजह
अलग-अलग तरह के मामलों के निपटान के लिए संबंधित अदालतों की तरफ से निर्धारित समय
सीमा की कमी, बार-बार मामले में सुनवाई का
टलना और सुनवाई के लिए मामलों की निगरानी, लंबित
मामलों को ट्रैक करने की व्यवस्था की कमी भी किसी भी केस के परिणाम तक पहुंचने में
बहुत समय लगा देती है।
.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)