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- 50% के आरक्षण बैरियर को खत्म कर 60-75% करने पर क्यू तुली हैं सरकारें...?
Posted by : achhiduniya
21 June 2024
पिछले कुछ सालों से आरक्षण बैरियर तोड़ने का ट्रेंड बढ़ा है।
इसकी बड़ी वजह भारत का राजनीतिक परिदृश्य है। कांग्रेस समेत विपक्ष की कई
पार्टियां आबादी से हिस्सेदारी की पैरवी करती आ रही हैं। इन दलों की सरकार आने पर
आसानी से आरक्षण बैरियर को तोड़ दिया जाता है। जानकार इसे हिंदुत्व के नैरेटिव के
काउंटर के रूप में भी देखते हैं। आरक्षण बैरियर तोड़ने की एक वजह ईडब्लूएस आरक्षण
पर दिया गया सुप्रीम फैसला भी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में केंद्र के उस फैसले को सही ठहराया था, जिसमें सवर्ण समुदाय के लोगों को सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया गया था। इसके बाद यह दलीलें
शुरू हो गई कि क्या अब कोर्ट ने 50 प्रतिशत के
आरक्षण बैरियर को खत्म कर दिया है? देश में
करीब छोटी बड़ी करीब 300 जातियां
है। इनमें 50 से ज्यादा
जातियों की आबादी 3 प्रतिशत से
अधिक है। ये जातियां राजनीतिक दबाव के तहत खुद के लिए अलग से कोटा मांगती हैं। आबादी
की वजह से राजनितिक दलों के लिए भी इनकी मांग को अनदेखा करना मुश्किल होता है। इस
कारण पार्टियां कई बार लिमिट से आगे जाकर आरक्षण देने की घोषणा कर देती है। आरक्षण बैरियर तोड़ने के पीछे राजनीतिक दलों का त्वरित फायदा
भी है। जैसे महाराष्ट्र
में मराठा आरक्षण साल 2018 में लागू
की गई। यह आरक्षण व्यवस्था साल 2021 तक चला। इस
दरम्यान महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हुए। दोनों ही चुनाव में
सत्ताधारी एनडीए को फायदा हुआ।
2014 के मुकाबले 2019 में बीजेपी की सीटों में बढ़ोतरी हुई। इसी तरह का मामला बिहार में भी देखने को मिला। 2023 में यह लागू किया गया, जिसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में इसे लागू करने वाली पार्टियों (जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और माले) को फायदा हुआ। जेडीयू की सीटें तो नहीं बढ़ी, लेकिन 2020 की तुलना में उसके 3 प्रतिशत वोट में जरूर इजाफा हुआ। छत्तीसगढ़ में 2012 में आरक्षण का दायरा बढ़ाया गया था। इस फैसले के बाद राज्य में जितने भी चुनाव हुए,उसमें से 2018 के विधानसभा चुनाव छोड़कर सभी चुनाव में आरक्षण के दायरे को बढ़ाने वाली बीजेपी को जीत मिली। इंदिरा सहनी केस 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया, जिसमें 50% के कैप लागू करने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने यह फैसला संविधान सभा की बहस में दिए गए भीमराव अंबेडकर के तर्क को आधार बनाकर दिया था।
इस तरह के फैसले को रोकने के लिए
सुप्रीम कोर्ट को बड़े स्तर पर सुनवाई करनी होगी। क्योंकि आरक्षण का दायरा सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने तय किया था। ऐसे इस मामले को सुनने के लिए कम
से कम 11 जजों की
बेंच की जरूरत होगी।



