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- सुप्रीम कोर्ट ने कही कावड़ यात्रा के दौरान नेम प्लेट पर बड़ी बात....?
Posted by : achhiduniya
22 July 2024
याचिकाकर्ता के वकील सिंघवी ने कहा कि भोजनालयों के मालिकों
के नाम प्रदर्शित करने संबंधी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड का आदेश पहचान के आधार
पर बहिष्कार है और यह
संविधान के खिलाफ है। याचिका
में दोनों राज्य सरकारों द्वारा जारी आदेश पर रोक लगाए जाने का आग्रह करते हुए कहा
कि ऐसे निर्देश समुदायों के बीच विवाद को बढ़ावा देते हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि
संबंधित आदेश मुस्लिम दुकान मालिकों और कारीगरों के आर्थिक बहिष्कार तथा उनकी
आजीविका को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से जारी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह भी
मायने रखता है कि कांवड़ियां क्या ये सोचते हैं? क्या उन्हें खाना किसी चुनिंदा
दुकानदार
से मिले? कांवड़ियों
की क्या अपेक्षा है? क्या वे
यह भी कहते हैं कि खाद्यान्न किसी खास समुदाय के सदस्यों द्वारा ही उगाया जाना
चाहिए? फिर
कानूनी सवाल- क्या कोई आदेश है? सुप्रीम
कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कहा,राज्य
पुलिस दुकानदारों को अपना नाम प्रदर्शित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। उन्हें केवल खाद्य पदार्थ की
जानकारी प्रदर्शित करने के लिए कहा जा सकता है। दुकान मालिकों, उनके कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने के लिए मजबूर नहीं
किया जाना चाहिए। दुकानों
पर मालिक और कर्मियों के नाम लिखने पर दबाव ना डाला जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये
स्वैच्छिक है,लेकिन
याचिकाकर्ता ने कहा कि हरिद्वार पुलिस ने केस इसको लागू किया है।
इसको देखें, वहां पुलिस की तरफ से चेतावनी दे गई कि अगर नहीं करते तो
कार्रवाई होगी। मध्य
प्रदेश में भी इस तरह की कार्रवाई की बात की गई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि ये
विक्रेताओं के लिए आर्थिक मौत को तरह है।सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सिंघवी से पूछा कि क्या उत्तर
प्रदेश, उत्तराखंड
ने भोजनालय मालिकों के नाम प्रदर्शित करने के संबंध में कोई औपचारिक आदेश दिया है? क्या राज्य सरकारों ने कोई औपचारिक आदेश पारित किया है? हालांकि, खंडपीठ
ने स्पष्ट किया कि भोजनालयों को परोसे जा रहे भोजन के प्रकार को प्रदर्शित करना
चाहिए।
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