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'आर्थिक विलेन'-आयात-निर्यात का बिगाड़ गणित,मिडिल ईस्ट में मचा कोहराम भारतीयों को कैसे करेगा प्रभावित...?
Posted by : achhiduniya
03 March 2026
वाणिज्य मंत्रालय ने एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाई, जिसमें युद्ध से पैदा होने वाले आर्थिक झटकों को कम करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया। बैठक में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि कैसे माल ढुलाई और बीमा की बढ़ती लागत को नियंत्रित किया जाए। सरकार ने 5 मोर्चे पर काम करने का फैसला लिया है। मिडिल ईस्ट में मचे इस कोहराम ने न केवल समुद्री रास्तों पर ताला लगा दिया है, बल्कि भारत के आयात-निर्यात के गणित को भी बिगाड़ कर रख दिया है। अब ये संकट केवल रणनीतिक नहीं रहा, बल्कि हमारे और आपके लिए आर्थिक विलेन बन गया है, जो जूते-कपड़े, ड्राइफ्रूट्स, दाल और फल-सब्जियों के दाम बढ़ा कर हमारे-आपके घरों का बजट बिगाड़ सकता है। मुंबई का जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) और मुंद्रा पोर्ट इस वक्त संकट के केंद्र में हैं। यहां
1,000 से अधिक कंटेनर फंसे हुए हैं,जिनमें नासिक का प्याज,अंगूर, केला और पपीता भरा है।
ये सामान खाड़ी देशों, विशेषकर दुबई के लिए रवाना होना था, लेकिन युद्ध के कारण
वहां का बाजार अस्थायी रूप से ठप है। सबसे बड़ी चिंता शिपिंग रूट को लेकर है। अभी
तक भारतीय जहाज होर्मुज जलडमरू मध्य के रास्ते कम समय में खाड़ी देशों तक पहुंच
जाते थे,लेकिन अब सुरक्षा कारणों से जहाजों को केप ऑफ गुड होप (अफ्रीका के नीचे से)
का लंबा चक्कर लगाकर यूरोप और अमेरिका जाना होगा। इस बदलाव के चलते समय की भी
बर्बादी होगी और लागत भी बढ़ेगी। रमजान का महीना चल रहा है और खाड़ी देशों (UAE,
सऊदी
अरब, कतर) में ईद के लिए भारत से भारी मात्रा में फल, सब्जियां, बासमती चावल और चीनी
का निर्यात होता है। अकेले यूएई को भारत हर महीने लगभग 3 अरब डॉलर का सामान
बेचता है।
निर्यातकों का कहना है कि अगर 10 दिनों तक युद्ध नहीं
रुका, तो 300 से अधिक कंटेनरों में
रखा पेरिशेबल जल्द खराब होने वाला माल बर्बाद हो जाएगा। निर्यातकों
पर प्रति कंटेनर 8,000 रुपये रोजाना का अतिरिक्त खर्च रेफ्रिजरेशन और
पार्किंग बढ़ गया है। युद्ध की मार सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है। भारत
से निर्यात होने वाले टेक्सटाइल (कपड़े) और फुटवियर (जूते) के ऑर्डर भी अधर में
लटके हैं। दूसरी ओर, दालों की कीमतों में उछाल आने की पूरी आशंका है। ऑल
इंडिया दाल मिलर्स एसोसिएशन के मुताबिक, भारत ऑस्ट्रेलिया से मसूर
और चना अरब सागर के रास्ते ही मंगवाता है। इस रूट पर
उथल-पुथल रही तो आने वाले दिनों में दालों के दाम बढ़ना तय है।
भारत और ईरान के बीच
कभी 17 अरब डॉलर का व्यापार होता था, जो अमेरिकी प्रतिबंधों
के बाद घटकर 1.68 अरब डॉलर रह गया है। भारत अब ईरान से मुख्य रूप से
सेब, पिस्ता, खजूर और कीवी मंगवाता
है। युद्ध लंबा खिंचा तो ड्राई फ्रूट्स के
शौकीनों की जेब ढीली होना तय है। इसके अलावा, भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भी संकट के
घेरे में है, जो मध्य एशिया तक पहुँचने का भारत का रणनीतिक
रास्ता है। एक ओर शिपिंग इंश्योरेंस और माल भाड़ा बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर घरेलू
बाजार में निर्यात रुकने से प्याज और अन्य फसलों के दाम गिरने का डर है। भारतीय
निर्यातक संस्था (FIEO) और हॉर्टिकल्चर एसोसिएशन ने सरकार से गुहार लगाई
है कि पोर्ट पर हो रहे अतिरिक्त खर्च में राहत दी जाए। अरब सागर में उठती ये लहरें
जल्द शांत नहीं हुईं, तो भारत में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।



