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Posted by : achhiduniya
21 March 2016
स्वयं
के द्वार से ही सत्य को जाना जाता है। सत्य को जान लेना आनंद में प्रतिष्ठित हो
जाना है। असत्य में होना दुख में होना है। अज्ञान में होना दुख में होना है। सत्य
की उस ज्ञान-दशा में आनंद उपलब्ध होता है। आनंद और आत्मा अलग न समझें। आनंद और सत्य अलग न समझें। स्वयं और सत्य अलग न
समझें। ऐसी जो प्रक्रिया का उपयोग क्रमश: अपने जीवन में करेगा, वह कभी निर्विचार
को अनुभव कर लेता है। निर्विचार को जो अनुभव कर लेता है, उसकी
पूरी विचार की शक्ति जाग्रत हो जाती है, जैसे किसी ने अंधेरे
में प्रकाश कर दिया हो या जैसे किसी ने अंधे को आंख दे दी हों, ऐसा उसे अनुभव होता है। हम अपने विचारों की धारा को दूर खडे होकर देखना
शुरू करें, तो क्रमश: जिस मात्रा में आपका साक्षी होना
विकसित होता है, उसी मात्रा में विचार शून्य होने लगते हैं।
विचार को शून्य करने का उपाय है विचार के प्रति पूर्ण सजग हो जाना। जो व्यक्ति जितना सजग हो जाएगा विचारों के प्रति
उतने ही विचार उसी भांति उसके मन में नहीं आते। जैसे घर में दीया जलता हो तो चोर न आएं और घर
में अंधकार हो तो चोर झांकें और अंदर आना चाहें। भीतर जो होश को जगा लेता है,
उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं। जितनी मूच्र्छा होती है भीतर,
जितना सोयापन होता है भीतर, उतने ज्यादा
विचारों का आगमन होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही
विचार क्षीण होने लगते हैं। विचारों में बहुत रस है, अगर आप
एक धर्म को मानते हैं, तो उस धर्म के विचारों में आपको बहुत
रस मिलता है। जिसे निर्विचार होना है, उसे विचारों के प्रति
विरस हो जाना चाहिए। उसे किसी विचार में कोई रस नहीं रह जाना चाहिए। उसे यह सोचना
चाहिए कि विचार से कोई प्रयोजन नहीं, इसलिए उसमें कोई रस
रखने का कारण नहीं। कैसे वह विरस होगा?यह संभव होगा विचारों के प्रति जागरूकता से अगर हम अपने विचारों के साक्षी
बन सके और यह बन सकना कठिन नहीं है।
