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- क्यो जरूरी है....... व्रत अथवा उपवास....?
Posted by : achhiduniya
09 April 2016
फास्टफूड
की संस्कृति को देखते हुए भारत की एक उपयोगी धार्मिक परंपरा का ध्यान आना
स्वाभाविक है। व्रत अथवा उपवास नामक यह परंपरा किसी परिचय की मोहताज नहीं है। स्वाद
के चक्कर में हम ठूंस-ठूंसकर खाते हैं और बार-बार खाते हैं। इससे हमारी पाचन
प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाती है और अंत में हम बीमार पड जाते हैं। सप्ताह के किसी
एक दिन यदि पूरा परिवार उपवास रखे तो उस दिन स्वास्थ्य के साथ-साथ अन्न की भी बचत
हो जाती है। लाल बहादुर शास्त्री जी ने इसी प्रणाली को अपनाया था। महात्मा गांधी
भी व्रत के सर्मथक थे, वे तो मौनव्रत तक रखा करते थे। आधुनिक
खान-पान ने अनेक व्याधियों को पैदा किया है। मोटापा, उच्च
रक्तचाप, हृदयरोग, मधुमेह तथा तनाव आदि
वे बीमारियां हैं, जिन्होंने मानव का जीना दूभर कर दिया है।
इसका दोषी और कोई नहीं, हम ही हैं, क्योंकि
हम स्वाद के गुलाम हो गए हैं।बीमार होने पर जब हम डॉक्टर के पास जाते हैं तो सबसे
पहले वह हमें परहेज करने को कहता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तथा आयुर्वेद दोनों ने उपवास का सर्मथन किया है। इन शास्त्रों का मानना है कि इससे रोगों को समूल नाश करने में आसानी हो जाती है। इसके लाभकारी पक्षों को देखते हुए हमें भी उपवास को अपने जीवन में स्थान देना चाहिए। यह सबसे सस्ता, सरल और उपयोगी साधन है। इसे कोई भी अपना सकता है। फिर भी मधुमेह, रक्तचाप और किसी गंभीर रोग से पीडित व्यक्ति को सावधानी बरतनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं और बच्चों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। आज आदमी हर काम फटाफट करना या करवाना चाहता है। सफलता के आयाम 'शॉर्टकट' में ढूंढे जाते हैं। अपनी भूख भी वह तुरंत शांत करना चाहता है वह भी अधिक से अधिक स्वाद के साथ।
मानव की इसी इच्छा के फलस्वरूप भोजन की एक नई संस्कृति ने जन्म लिया जिसका नामकरण किया गया, 'फास्टफूड'। हमने सेहत के स्थान पर स्वाद को प्रमुखता दी।हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है। रात को प्रकाश का प्रदूषण है जिसके कारण हम सितारों की कुदरती रोशनी नहीं देख पाते और ध्वनि प्रदूषण भी दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है.। इसी क्रम में 'भोजन प्रदूषण' भी जोड लेना चाहिए। ये फास्टफूड ही है जिसने हमारे स्वादिष्ट और स्वास्थ्यपरक देशी खान-पान को दूषित करके रख दिया है।इसने हमको बीमार और आलसी बना दिया है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तथा आयुर्वेद दोनों ने उपवास का सर्मथन किया है। इन शास्त्रों का मानना है कि इससे रोगों को समूल नाश करने में आसानी हो जाती है। इसके लाभकारी पक्षों को देखते हुए हमें भी उपवास को अपने जीवन में स्थान देना चाहिए। यह सबसे सस्ता, सरल और उपयोगी साधन है। इसे कोई भी अपना सकता है। फिर भी मधुमेह, रक्तचाप और किसी गंभीर रोग से पीडित व्यक्ति को सावधानी बरतनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं और बच्चों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। आज आदमी हर काम फटाफट करना या करवाना चाहता है। सफलता के आयाम 'शॉर्टकट' में ढूंढे जाते हैं। अपनी भूख भी वह तुरंत शांत करना चाहता है वह भी अधिक से अधिक स्वाद के साथ।
मानव की इसी इच्छा के फलस्वरूप भोजन की एक नई संस्कृति ने जन्म लिया जिसका नामकरण किया गया, 'फास्टफूड'। हमने सेहत के स्थान पर स्वाद को प्रमुखता दी।हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है। रात को प्रकाश का प्रदूषण है जिसके कारण हम सितारों की कुदरती रोशनी नहीं देख पाते और ध्वनि प्रदूषण भी दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है.। इसी क्रम में 'भोजन प्रदूषण' भी जोड लेना चाहिए। ये फास्टफूड ही है जिसने हमारे स्वादिष्ट और स्वास्थ्यपरक देशी खान-पान को दूषित करके रख दिया है।इसने हमको बीमार और आलसी बना दिया है।


