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- खालसा पंथ के संस्थापक श्री गुरु गोबिंद सिंघ जयंती विशेष.....
Posted by : achhiduniya
24 December 2017
सिख धर्म में गुरु गोविंद सिंह को शौर्य और अध्यात्मिक ज्ञान
के प्रतीक के तौर पर माना जाता है। अपने जीवन में गुरु गोबिंद सिंघ शौर्य और बलिदान
के लिए जाने जाते हैं,जिसे लेकर हर
साल प्रकाश पर्व भी मनाया जाता है। अपने पिता गुरु तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त
11 नवम्बर सन 1675 को वे गुरु बने थे। गुरु
गोविंद सिंह एक महान योद्धा और कवि भी थे। 1699 में गुरु गोबिंद
सिंघ ने बैसाखी के दिन अपने 5 शिष्यों को लेकर खालसा पंथ की स्थापना
की थी। जीवन में आगे बढ़ने के लिए गुरु गोबिंद सिंघ ने लोगों को शिक्षा देते हुए कई
सीख भी दी। गुरु गोबिंद सिंघ ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया
और उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है।
यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरु गोबिंद सिंघ की कृतियों के संकलन का नाम है। श्री गुरु गोबिंद सिंघ का जन्म पौष शुक्ल सप्तमी सन् 1666 में पुण्य माता श्री गुजरी की गोद में पटना साहिब में हुआ था। आप बचपन में ही बड़े साहसी और गुणों से भरपूर थे। आनंदपुर साहिब में ही आपकी शिक्षा का प्रबंध किया गया। उन्हें फारसी, हिन्दी, संस्कृत और ब्रज भाषा पढ़ाई गई। जब गुरु तेगबहादुर जी बलिदान देने दिल्ली गए थे। तब गुरुजी की उम्र केवल 9 वर्ष की थी। गुरु गद्दी संभाल लेने के बाद आपने जनता में जोश भरना शुरू कर दिया। आपने अपने दरबार 52 कवि रखकर लोगों में वीर रस की कविताओं का प्रचलन किया।
आपने अत्याचारों के विरुद्ध कई युद्ध किए, इसमें सबसे प्रसिद्ध भंगानी का युद्ध हुआ था। यह युद्ध भीमचंद नामक पहाड़ी राजा से हुआ था। यह भीमचंद वही था जिसको गुरु हरगोविंद सिंह ने ग्वालियर की कैद से छुड़ाया था। इस युद्ध में पहाड़ी राजाओं की करारी हार हुई। इस युद्ध में पीरबुद्ध, शाह अपने 800 मुरीदों सहित गुरुजी की सहायता के लिए आया था। सन 1688 में नदौन का युद्ध हुआ जो जम्मू के नवाब अलफ खाँ के साथ हुआ था। सन1689 में पहाड़ी नवाब हुसैन खाँ ने गुरुजी से युद्ध छेड़ दिया, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। सन 1699 को वैशाखी वाले दिन गुरुजी ने केशगढ़ साहिब में पंच पियारों द्वारा तैयार किया हुआ अमृत सबको पिलाकर खालसा पंथ की नींव रखी। खालसा का मतलब है वह सिक्ख जो गुरु से जुड़ा है। वह किसी का गुलाम नहीं है, वह पूर्ण स्वतंत्र है। सन 1700 से1703 तक आपने पहाड़ी राजाओं से आनंदपुर साहिब में चार बड़े युद्ध किए व हर युद्ध में विजय प्राप्त की।
पहाड़ी राजाओं की प्रार्थना पर गुरुजी को पकड़ने के लिए औरंगजेब ने सहायता भेजी। मई सन 1704 की आनंदपुर की आखिरी लड़ाई में मुगल फौज ने आनंदपुर साहिब को 6 महीने तक घेरे रखा। अंत में गुरुजी सिक्खों के बहुत मिन्नतें करने पर अपने कुछ सिक्खों के साथ आनंदपुर साहिब छोड़कर चले गए। सिरसा नदी के किनारे एक भयंकर युद्ध हुआ। इसमें दो छोटे साहिबजादे माता गुजरी बिछुड़ गए। 22 दिसंबर सन 1704 में‘चमकौर का युद्ध’ नामक ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें 40 सिक्खों ने 10 लाख फौज का सामना किया। इस युद्ध में बड़े साहिबजादे अजीतसिंह और जुझारसिंहजी शहीद हुए।गुरुजी ने अपने सुपत्रों की कुर्बानी देकर एक इतिहास कायम किया और सीखो को अपनी संतान के रूप मे सुशोभित किया। गुरुजी ने पहले ही शब्द रूप गुरु ग्रंथ साहिब जी को गुरु का दर्जा देकर 7 अक्टूबर, 1708 दिव्य ज्योति से ज्योति मे मिल गए।
यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरु गोबिंद सिंघ की कृतियों के संकलन का नाम है। श्री गुरु गोबिंद सिंघ का जन्म पौष शुक्ल सप्तमी सन् 1666 में पुण्य माता श्री गुजरी की गोद में पटना साहिब में हुआ था। आप बचपन में ही बड़े साहसी और गुणों से भरपूर थे। आनंदपुर साहिब में ही आपकी शिक्षा का प्रबंध किया गया। उन्हें फारसी, हिन्दी, संस्कृत और ब्रज भाषा पढ़ाई गई। जब गुरु तेगबहादुर जी बलिदान देने दिल्ली गए थे। तब गुरुजी की उम्र केवल 9 वर्ष की थी। गुरु गद्दी संभाल लेने के बाद आपने जनता में जोश भरना शुरू कर दिया। आपने अपने दरबार 52 कवि रखकर लोगों में वीर रस की कविताओं का प्रचलन किया।
आपने अत्याचारों के विरुद्ध कई युद्ध किए, इसमें सबसे प्रसिद्ध भंगानी का युद्ध हुआ था। यह युद्ध भीमचंद नामक पहाड़ी राजा से हुआ था। यह भीमचंद वही था जिसको गुरु हरगोविंद सिंह ने ग्वालियर की कैद से छुड़ाया था। इस युद्ध में पहाड़ी राजाओं की करारी हार हुई। इस युद्ध में पीरबुद्ध, शाह अपने 800 मुरीदों सहित गुरुजी की सहायता के लिए आया था। सन 1688 में नदौन का युद्ध हुआ जो जम्मू के नवाब अलफ खाँ के साथ हुआ था। सन1689 में पहाड़ी नवाब हुसैन खाँ ने गुरुजी से युद्ध छेड़ दिया, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। सन 1699 को वैशाखी वाले दिन गुरुजी ने केशगढ़ साहिब में पंच पियारों द्वारा तैयार किया हुआ अमृत सबको पिलाकर खालसा पंथ की नींव रखी। खालसा का मतलब है वह सिक्ख जो गुरु से जुड़ा है। वह किसी का गुलाम नहीं है, वह पूर्ण स्वतंत्र है। सन 1700 से1703 तक आपने पहाड़ी राजाओं से आनंदपुर साहिब में चार बड़े युद्ध किए व हर युद्ध में विजय प्राप्त की।
पहाड़ी राजाओं की प्रार्थना पर गुरुजी को पकड़ने के लिए औरंगजेब ने सहायता भेजी। मई सन 1704 की आनंदपुर की आखिरी लड़ाई में मुगल फौज ने आनंदपुर साहिब को 6 महीने तक घेरे रखा। अंत में गुरुजी सिक्खों के बहुत मिन्नतें करने पर अपने कुछ सिक्खों के साथ आनंदपुर साहिब छोड़कर चले गए। सिरसा नदी के किनारे एक भयंकर युद्ध हुआ। इसमें दो छोटे साहिबजादे माता गुजरी बिछुड़ गए। 22 दिसंबर सन 1704 में‘चमकौर का युद्ध’ नामक ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें 40 सिक्खों ने 10 लाख फौज का सामना किया। इस युद्ध में बड़े साहिबजादे अजीतसिंह और जुझारसिंहजी शहीद हुए।गुरुजी ने अपने सुपत्रों की कुर्बानी देकर एक इतिहास कायम किया और सीखो को अपनी संतान के रूप मे सुशोभित किया। गुरुजी ने पहले ही शब्द रूप गुरु ग्रंथ साहिब जी को गुरु का दर्जा देकर 7 अक्टूबर, 1708 दिव्य ज्योति से ज्योति मे मिल गए।



