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- राहुल गांधी की ताजपोशी क्या कांग्रेस को दिला पाएगी सत्ता की वापसी.....?
Posted by : achhiduniya
17 December 2017
कांग्रेस उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बने राहुल गांधी की सबसे
बड़ी ताकत 13 साल का उनका
राजनीतिक अनुभव है। इस दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद और पार्टी के
उपाध्यक्ष की हैसियत से राजनीति का भरपूर अनुभव हासिल कर लिया है। सन 2014 में सत्ता से बेदखल होने के कुछ पहले से संगठन के तौर पर कांग्रेस की
कमज़ोरी गिनाई जा सकती हैं। यह कमज़ोरी राहुल गांधी को अपने प्रदर्शन के लिए एक मौका
भी मुहैया कराती है। दूसरी कमज़ोरी उनमें यह ढूंढी जा सकती है कि वह इस दौर के सबसे
सनसनीखेज लक्षण घृणा और सामाजिक विघटन की बुराई का मुकाबला सांप्रदायिक प्रतिघृणा
या प्रतिहिंसक तरीके से नहीं करना चाहते।
इधर जनता की दिलचस्पीं ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए देखने में बढ़ गई है। राहुल गांधी जनता में प्रेम, अंहिसा या सदभाव के प्रति कितना आकर्षण बढ़ा पाएंगे यह भविष्य के गर्भ में है। इस दौरान अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के सबसे ज़्यादा हमले उन्होंने ही झेले हैं। इन अनुभवों ने उन्हें भविष्य की मजबूती के लिए तैयार किया होगा। नवीनतम अनुभव के रूप में गुजरात चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी को जिस तरह से शून्य से उठाकर लड़ने लायक बनाया है वह उनकी ताकत को साबित करता है। राजनीतिक दल के रूप में चाहे कांग्रेस सत्ता में रहे या विपक्ष में, यह तय है कि देश के नियंता के रूप में कांग्रेस की बड़ी भूमिका को कोई नहीं नकार सकता। राहुल गांधी ने अपने उपहास के जितने हमलों को झेलते हुए जिस तरह से संयमित रहने का अभ्यास किया है,वह विलक्षण सहनशीलता का उदाहरण माना जा सकता है।
उन्होंने अच्छे श्रोता गुण हासिल कर लिया है। सक्रिय राजनीति के बावजूद उनकी छवि अब तक पूर्वाग्रही की नहीं बनी। पार्टी में उन्होंने अपना कोई गुट नहीं बनने दिया। यह उनके पदारोहण समारोह में भी दिखा। सोनिया गांधी के अलावा सिर्फ मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी और मधुसूदन मिस्त्री ही प्रमुखता से दिखे। कुछ विशेषज्ञ राहुल गांधी के लिए वर्तमान समय को जोखिम का समय कह सकते हैं,लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए कि ये जोखिम ही मौका पैदा करते हैं। गौरतलब है कि उनके पदारोहण के बाद ही गुजरात के नतीजे आने वाले हैं।
इधर जनता की दिलचस्पीं ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए देखने में बढ़ गई है। राहुल गांधी जनता में प्रेम, अंहिसा या सदभाव के प्रति कितना आकर्षण बढ़ा पाएंगे यह भविष्य के गर्भ में है। इस दौरान अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के सबसे ज़्यादा हमले उन्होंने ही झेले हैं। इन अनुभवों ने उन्हें भविष्य की मजबूती के लिए तैयार किया होगा। नवीनतम अनुभव के रूप में गुजरात चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी को जिस तरह से शून्य से उठाकर लड़ने लायक बनाया है वह उनकी ताकत को साबित करता है। राजनीतिक दल के रूप में चाहे कांग्रेस सत्ता में रहे या विपक्ष में, यह तय है कि देश के नियंता के रूप में कांग्रेस की बड़ी भूमिका को कोई नहीं नकार सकता। राहुल गांधी ने अपने उपहास के जितने हमलों को झेलते हुए जिस तरह से संयमित रहने का अभ्यास किया है,वह विलक्षण सहनशीलता का उदाहरण माना जा सकता है।
उन्होंने अच्छे श्रोता गुण हासिल कर लिया है। सक्रिय राजनीति के बावजूद उनकी छवि अब तक पूर्वाग्रही की नहीं बनी। पार्टी में उन्होंने अपना कोई गुट नहीं बनने दिया। यह उनके पदारोहण समारोह में भी दिखा। सोनिया गांधी के अलावा सिर्फ मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी और मधुसूदन मिस्त्री ही प्रमुखता से दिखे। कुछ विशेषज्ञ राहुल गांधी के लिए वर्तमान समय को जोखिम का समय कह सकते हैं,लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए कि ये जोखिम ही मौका पैदा करते हैं। गौरतलब है कि उनके पदारोहण के बाद ही गुजरात के नतीजे आने वाले हैं।


