- Back to Home »
- Discussion »
- नग्न घुटनों के साथ पुरुषों को फुटबॉल खेलते देखना इस्लाम के नियमों के विरुद्ध..... मुफ्ती अतहर कासमी का फतवा
नग्न घुटनों के साथ पुरुषों को फुटबॉल खेलते देखना इस्लाम के नियमों के विरुद्ध..... मुफ्ती अतहर कासमी का फतवा
Posted by : achhiduniya
30 January 2018
देवबंद के मुफ्ती कासमी का विवादित फतवा ऐसे वक्त में आया है,
जब मुस्लिम देश सऊदी अरब ने इसी महीने अपने यहां की महिलाओं को
स्टेडियम में फुटबॉल मैच देखने की इजाजत दे दी है। सऊदी अरब में सुन्नी मुसलमान
बहुतायत में हैं। यूपी के सहारनपुर स्थित दारुल उलूम
देवबंद के मुफ्ती ने एक फतवा जारी किया है। देवबंद के मुफ्ती अतहर कासमी ने
कहा है कि नग्न घुटनों के साथ पुरुषों को फुटबॉल खेलते देखना इस्लाम के नियमों के विरुद्ध है और मुस्लिम महिलाओं के लिए यह
हराम है। दारुल उलूम से जुड़े हुए मुफ्ती कासमी ने उन पुरुषों को भी कठघरे में
खड़ा किया, जो अपनी बीवियों को टेलिविजन पर फुटबॉल देखने की
इजाजत देते हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में
स्थित दारुल उलूम देवबंद 150 साल पुराना इस्लामिक तालीम का
संस्थान है।
इस यूनिवर्सिटी में मुस्लिम धर्म से जुड़े सुन्नी हनफी धर्मशास्त्र के बारे में पढ़ाई होती है। हालांकि कुछ कट्टरपंथी संगठनों मसलन अफगानिस्तान में तालिबान आंदोलन की बुनियाद भी यहीं से मानी जाती है। अपने धर्मोपदेश में कासमी ने कहा, 'क्या आपको शर्म नहीं आती? क्या आप ऊपरवाले से नहीं डरते हैं? आप उन्हें (अपनी बीवियों को) ऐसी चीजें क्यों देखने देते हैं। कासमी अपने फतवे के समर्थन में कहते हैं,महिलाओं को इन फुटबॉल मैचों को देखने की जरूरत ही क्या है? फुटबॉल खिलाड़ियों की जांघों को देखकर उन्हें क्या फायदा मिलेगा। मैच देखते वक्त उनका ध्यान केवल इसी तरफ रहेगा। यहां तक कि वे मैच के स्कोर को भी भूल जाएंगी।
लखनऊ की एक मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता साहिरा नसीह ने इस फतवे की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, 'इसका मतलब यह है कि मुस्लिम महिलाओं को ऐथलेटिक (दौड़), टेनिस और तैराकी भी नहीं देखनी चाहिए। किसी पुरुष को खेलते हुए देखना किसी महिला के लिए अनैतिक कैसे हो सकता है।
इस यूनिवर्सिटी में मुस्लिम धर्म से जुड़े सुन्नी हनफी धर्मशास्त्र के बारे में पढ़ाई होती है। हालांकि कुछ कट्टरपंथी संगठनों मसलन अफगानिस्तान में तालिबान आंदोलन की बुनियाद भी यहीं से मानी जाती है। अपने धर्मोपदेश में कासमी ने कहा, 'क्या आपको शर्म नहीं आती? क्या आप ऊपरवाले से नहीं डरते हैं? आप उन्हें (अपनी बीवियों को) ऐसी चीजें क्यों देखने देते हैं। कासमी अपने फतवे के समर्थन में कहते हैं,महिलाओं को इन फुटबॉल मैचों को देखने की जरूरत ही क्या है? फुटबॉल खिलाड़ियों की जांघों को देखकर उन्हें क्या फायदा मिलेगा। मैच देखते वक्त उनका ध्यान केवल इसी तरफ रहेगा। यहां तक कि वे मैच के स्कोर को भी भूल जाएंगी।
लखनऊ की एक मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता साहिरा नसीह ने इस फतवे की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, 'इसका मतलब यह है कि मुस्लिम महिलाओं को ऐथलेटिक (दौड़), टेनिस और तैराकी भी नहीं देखनी चाहिए। किसी पुरुष को खेलते हुए देखना किसी महिला के लिए अनैतिक कैसे हो सकता है।


