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सात सीटें छोड़कर कांग्रेस गठबंधन के करीब होने का भ्रम न फैलाए,कांग्रेस के साये से भी दूरी.... BSP सुप्रीमो मायावती
Posted by : achhiduniya
18 March 2019
सपा-बसपा का गठबंधन ने हमेशा की तरह इस बार भी राहुल गांधी की सीट अमेठी और सोनिया गांधी सीट रायबरेली से प्रत्याशी खड़े नहीं किए हैं। इससे पहले जब सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ती थीं, तब भी दोनों पार्टियां इन दोनों नेताओं के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारती थीं। कांग्रेस को इन दो सीटों पर वाकओवर देने के बारे में सपा और बसपा के सुर अलग हैं। अखिलेश यादव ने एक बयान में यहां तक कहा कि कांग्रेस गठबंधन में कैसे नहीं है, हमने कांग्रेस के लिए दो सीटें छोड़ी हैं। विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ चुके अखिलेश यादव को अब तक यूपी को यह साथ पसंद है वाला नारा भूला नहीं है।
इसीलिए वे एक तरफ
गुलदस्ता लेकर मायावती से मिल आते हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस की तरफ भी मुस्कान
बिखेरते हैं। अखिलेश की रणनीति दिखाती है
कि उन्हें कांग्रेस से कोई परहेज नहीं है,लेकिन मायावती
की स्थिति इससे अलग है। वे जितना हमला भारतीय जनता पार्टी पर नहीं कर रही हैं, उससे ज्यादा हमला कांग्रेस पर करती नजर आ रही हैं।
शुरू में तो लगा कि कांग्रेस पर हमला सधा हुआ राजनैतिक अभिनय हो सकता है, लेकिन अब लग रहा है कि इसमें कुछ वजूद है। क्योंकि
जिस तरह से गठबंधन के लिए सात सीटें छोड़ने पर मायावती ने कहा कि कांग्रेस चाहे तो
80 सीटों पर चुनाव लड़ ले। मायावती ने जोर
देकर कहा कि कांग्रेस गठबंधन के करीब होने का भ्रम न फैलाए। बसपा के पास मुख्य रूप
से पश्चिम यूपी की सीटें हैं तो मायावती के कांग्रेस के साये से बचने की वजह
पश्चिमी यूपी में छिपी है। पश्चिमी यूपी में मुसलमान वोटर निर्णायक होता है।
यहां
की कम से कम 20 सीटें स्पष्ट तौर पर मुस्लिम वोटों से तय होती हैं। अगर कांग्रेस
चुनाव मैदान में खुलकर उतरती है तो मुस्लिम वोटों का रुझान कांग्रेस की तरफ भी हो
सकता है अगर इस वोट का ठीकठाक हिस्सा कांग्रेस के पास गया तो बसपा के लिए बड़ी
मुसीबत हो जाएगी। मायावती को यह डर अखिलेश की तुलना में इसलिए भी ज्यादा सता रहा
है कि बसपा अतीत में बीजेपी के साथ सरकार बना चुकी है। बीजेपी के खिलाफ राजनीति
में बसपा का खूंटा सपा की तुलना में कमजोर माना जाता है। वैसे भी लोकसभा का चुनाव
प्रधानमंत्री के लिए होता है मुख्यमंत्री के लिए नहीं। ऐसे में मोदी के सामने अगर
कोई आदमी पीएम पद का दावेदार है तो कम से कम मायावती तो नहीं ही हैं। अतीत में
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस इन समीकरणों का लाभ उठाकर मुस्लिम वोट अपनी तरफ खींचती
रही है।
अगर कांग्रेस ने इस बार भी ऐसा कर लिया तो बसपा को बहुत बड़ा घाटा हो
जाएगा। अखिलेश यादव को जब कांग्रेस के मामले में संयम से पेश आ रहे हैं तो मायावती
क्यों इतनी ज्यादा मुखर हो रही हैं। क्योंकि अगर कांग्रेस की रणनीति देखें तो
कांग्रेस ने मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश पर फोकस किया है। प्रियंका गांधी को
इसी इलाके के लिए महासचिव बनाया गया है। उनकी चुनावी नौका यात्रा भी इसी इलाके में
हो रही है और यह भी दिलचस्प बात है कि गबठबंधन में इस इलाके की बहुत सी सीटें सपा
के पास हैं।



