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- किसी भी कंप्यूटर प्रणाली को इंटरसेप्ट करके सरकार निजता के मौलिक अधिकार का हनन कर रही...
Posted by : achhiduniya
02 July 2019
सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69 किसी कंप्यूटर संसाधन के जरिए
किसी सूचना पर नजर रखने या उन्हें देखने के लिए निर्देश जारी करने की शक्तियों से
जुड़ी है। पहले के एक आदेश के मुताबिक, केंद्रीय गृह
मंत्रालय को भारतीय टेलीग्राफ कानून के प्रावधानों के तहत फोन कॉलों की टैपिंग और
उनके विश्लेषण के लिए खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को अधिकृत करने या मंजूरी देने
का भी अधिकार है। 10 केंद्रीय एजेंसियों को किसी भी कंप्यूटर की निगरानी और डाटा
की जांच का अधिकार दिए जाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई
टाल दी है। याचिकाओं में सरकार के आदेश को मनमाना बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का
कहना है कि सरकार निजता के मौलिक अधिकार का हनन कर रही है।
किसी भी कंप्यूटर
प्रणाली को इंटरसेप्ट करने या उनकी निगरानी के लिए 10 केंद्रीय एजेंसियों को
अधिकृत करने संबंधी सरकार की अधिसूचना को बीते साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट में
चुनौती दी गई थी। एक वकील ने केंद्र सरकार की 20 दिसंबर की अधिसूचना को चुनौती
देते हुए कोर्ट से इसे निरस्त करने का अनुरोध किया था। गृह मंत्रालय के अधिकारियों
ने बताया था कि सरकार की अधिसूचना के अनुसार, 10 केन्द्रीय
जांच एजेन्सियों को सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत कंप्यूटर इंटरसेप्ट करने और
उसकी सामग्री का विश्लेषण करने का अधिकार प्रदान किया गया है। आदेश में कहा गया था, उक्त अधिनियम (सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 की धारा 69) के तहत सुरक्षा और खुफिया
एजेंसियों को किसी कंप्यूटर सिस्टम में तैयार, पारेषित, प्राप्त या भंडारित किसी भी प्रकार की सूचना के
अंतरावरोधन (इंटरसेप्शन), निगरानी (मॉनिटरिंग) और विरूपण
(डीक्रिप्शन) के लिए प्राधिकृत करता है।
इस अधिसूचना में शामिल एजेंसियों में
गुप्तचर ब्यूरो, नार्कोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, केन्द्रीय
प्रत्यक्ष कर बोर्ड (आय कर विभाग के लिये), राजस्व
गुप्तचर निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, रॉ, सिग्नल
गुप्तचर निदेशालय (जम्मू कश्मीर, पूर्वोत्तर और
असम के क्षेत्रों के लिए) और दिल्ली के पुलिस आयुक्त शामिल हैं।


