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क्यू फांसी देने के पहले हकीकत में फिल्मों की तरह नही पुछी जाती अपराधी की आखरी इच्छा..जाने असली वजह व फांसी की प्रक्रिया ....?
Posted by : achhiduniya
08 January 2020
अक्सर फिल्मों में यह दिखाया जाता है कि अदालत द्वारा अपराध सिद्ध होने पर अपराधी को फांसी देने के पहले उसकी आखरी इच्छा पुछी जाती है,लेकिन हकीकत में इसका उलट होता है। किसी भी अपराधी को फांसी
कैसे दी जाती है और फांसी पर लटकाए जाने से पहले क्या-क्या किया जाता है इसकी
समूची प्रक्रिया के बारे में एक निजी टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में 35 साल तक तिहाड़ जेल में लॉ ऑफिसर रहे चुके सुनील गुप्ता ने बताया,जिस दिन फांसी दी जानी होती है,सुबह 4:30 या 5 बजे के करीब अपराधी को चाय पिलाई जाती है। वे
नहाना चाहें, तो नहा भी लेते हैं। नाश्ता करना चाहते हैं,तो नाश्ता भी करवाया जाता है।
उसके बाद मजिस्ट्रेट अपराधी के पास जाते हैं।
वह एक्ज़ीक्यूटिव मजिस्ट्रेट होते हैं। जो अपराधी से किसी वसीयत आदि के बारे में
पूछते हैं,पूछते हैं कि आपको अपनी कोई जायदाद किसी के नाम
करनी है,तो कर सकते हैं। अपराधी की वसीयत रिकॉर्ड हो जाने के
बाद हैंगमैन पहुंचता है,जो अपराधी को काली पोशाक पहनाता है। उसके
हाथ शरीर के पीछे बांध दिए जाते हैं और उसे फांसी के तख्ते पर लाया जाता है। तख्ते
पर जेल सुपरिंटेंडेंट का इशारा होते ही लीवर खींचकर तख्ते को एक वेल में गिरा दिया
जाता है। लीवर खींचे जाने के दो घंटे बाद डॉक्टर को यह सुनिश्चित करना होता है कि
अपराधी की ज़िन्दगी खत्म हो चुकी है और फिर पोस्टमॉर्टम भी होता है। तिहाड़ जेल के
प्रवक्ता रह चुके सुनील गुप्ता ने कहा कि जिस वक्त किसी अपराधी को फांसी दी जाती
है।
उस वक्त पूरी जेल को बंद रखा जाता है। नियम के मुताबिक जब फांसी की प्रक्रिया
पूरी हो जाती है,तब जेल को दोबारा खोला जाता है। सुप्रीम
कोर्ट की गाइडलाइनों के तहत फांसी और पोस्टमॉर्टम के बाद अपराधी के परिजनों को शव
सौंपने की प्रक्रिया के बारे में पूछे जाने पर सुनील गुप्ता ने कहा जब लगता है कि
बॉडी या अपराधी की बिलॉन्गिंग का मिसयूज़ हो सकता है,तो जेल
सुपरिंटेंडेंट को अधिकार है कि वह शव या बिलॉन्गिंग देने से इंकार कर सकता है। सुनील
गुप्ता से जब पूछा गया,फिल्मों में देखा जाता है कि अपराधी
से उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है,वह क्या है...? इसके जवाब में उन्होंने कहा,आखिरी इच्छा वाली कोई
बात नहीं होती मान लीजिए, अपराधी आखिरी इच्छा के तौर पर कह
दे कि उसे फांसी नहीं दी जाए,तो उसकी बात नहीं मानी जा सकती
या कोई भी ऐसी चीज़ मांग ले, जो आप नहीं दे सकते तो यह भ्रम
है।
जेल मैनुअल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। सुनील गुप्ता ने फांसी की रस्सी के
विशेष होने और उसे बक्सर जेल से मंगाए जाने के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में
कहा,यह रस्सी कुछ लचीली होती है और इसके फाइबर कुछ मज़बूत
होते हैं,जिनमें वैक्सिंग भी की गई होती है। इससे फायदा यह
है कि जब फांसी दी जाती है,तो अपराधी का टॉर्चर नहीं होता। बक्सर
की रस्सी की अपनी विशेषता है,जैसे तिहाड़ के प्रोडक्ट की है। आजकल
वैसे भी ज्यादा फांसी होती ही कहां हैं। सो, मुझे नहीं लगता
कि उनकी रस्सी ज्यादा मंगाई जाती होगी। [निजी टीवी चैनल आभार]



