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- लखनऊ में सीएए विरोधी हिंसा और तोड़फोड़ में शामिल आरोपियों के पोस्टर के चलते घिरी UP सरकार..किस अधिकार के तहत लगाए पोस्टर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा UP सरकार से सवाल..?
लखनऊ में सीएए विरोधी हिंसा और तोड़फोड़ में शामिल आरोपियों के पोस्टर के चलते घिरी UP सरकार..किस अधिकार के तहत लगाए पोस्टर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा UP सरकार से सवाल..?
Posted by : achhiduniya
12 March 2020
उत्तर प्रदेश सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून के
विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ के आरोपियों के पोस्टर हटाने के
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल
की थी। कोर्ट ने नौ मार्च को लखनऊ प्रशासन को यह आदेश दिया था। अदालत ने राज्य
सरकार को यह भी आदेश दिया था कि कानूनी प्रावधान के बगैर ऐसे पोस्टर नहीं लगाये
जायें। अदालत ने आरोपियों के नाम और फोटो के साथ लखनऊ में सड़क किनारे लगाये गये
इन पोस्टरों को तुरंत हटाने का निर्देश देते हुये टिप्पणी की थी कि पुलिस की यह कार्रवाई
जनता की निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप है।
अदालत ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट और
पुलिस आयुक्त को 16 मार्च या इससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश
दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश
सरकार से कहा कि फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो आपकी इस कार्रवाई का समर्थन करता
हो साथ ही कोर्ट ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण मामला है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश
सरकार से पूछा कि क्या उसके पास ऐसे पोस्टर लगाने की शक्ति है। उच्च न्यायालय ने
अपने आदेश में टिप्पणी की थी कि प्राधिकारियों की इस कार्रवाई से संविधान के
अनुच्छेद 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकार का हनन होता है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत
किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा प्रतिपादित प्रक्रिया का पालन किये बगैर उनकी
वैयक्तिक स्वतंत्रता और जीने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
वही यह दलील दी जा रही
है कि इन पोस्टरों को लगाने का मकसद प्रदेश की राजधानी
में 19 दिसंबर को आयोजित नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों के दौरान
सार्वजनिक संपत्ति को कथित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को शर्मसार करना
था। इन पोस्टरों में प्रकाशित नामों और तस्वीरों में सामाजिक कार्यकर्ता एवं नेता
सदफ जाफर, और पूर्व आईपीएस अधिकारी एस आर दारापुरी के नाम भी शामिल थे। ये
पोस्टर लखनऊ के प्रमुख चौराहों पर लगाये गये हैं।


