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कुतुब मीनार के अंदर मंदिर होने पर छिड़ा विवाद..पूरे परिसर में 27 हिंदू-जैन मंदिर मौजूद होने का दावा...कोर्ट में लगाई गई याचिका
Posted by : achhiduniya
09 December 2020
दिल्ली के महरौली स्थित कुतुब मीनार को वैश्विक
ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा मिला हुआ है। इसकी ऊंचाई 72.5 मीटर है जो दुनिया की सबसे
ऊंची मीनार है। इसमें कुल 379 सीढ़ियों का निर्माण किया गया है। साल 1199 में
कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस ऐतिहासिक कुतुब मीनार का निर्माण करवाया था। दिल्ली के
साकेत कोर्ट में लगाई गई याचिका में कुतुब मीनार के ऐतिहासिक धरोहर के अंदर पूजा-पाठ की इजाजत मांगी गई है। गौरतलब है की कोर्ट में लगाई गई याचिका में
पहले जैन तीर्थकर ऋषभ देव और भगवान विष्णू के नाम से दाखिल की गई है। वकील हरिशंकर
जैन की तरफ से दाखिल याचिका पर मंगलवार को सिविल जज के सामने शुरुआती बहस हुई। 24
दिसंबर को मामला अगली सुनवाई के लिए लगाया गया है। दरअसल, इस याचिका में दावा किया गया है कि दिल्ली के पहले मुस्लिम शासक
कुतुबुद्दीन ऐबक की तरफ से 1192 में बनवाई गई इस मस्जिद में मुसलमानों ने कभी नमाज़
नहीं पढ़ी। इसकी वजह यह थी कि मंदिरों की सामग्री से बनी इमारत के खंभों, मेहराबों, दीवार और छत पर जगह-जगह हिंदू
देवी देवताओं की मूर्तियां थीं। उन मूर्तियों और धार्मिक प्रतीकों को आज भी देखा
जा सकता है। याचिका में बताया गया है कि आज का महरौली दअरसल मिहिरावली है। इसे
चौथी सदी के महान शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक वराहमिहिर
ने बसाया था। इतिहास के प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलविद वराहमिहिर ने ग्रहों की गति
के अध्ययन के लिए विशाल स्तंभ का निर्माण करवाया। इसे ध्रुव स्तंभ या मेरु स्तंभ
कहा जाता था। मुस्लिम शासकों के दौर में इसे
कुतुब मीनार नाम दे दिया गया। इसी परिसर में 27 नक्षत्रों के प्रतीक के तौर पर 27
मंदिर थे। इनमें जैन तीर्थंकरों के साथ भगवान विष्णु, शिव, गणेश आदि के मंदिर थे। यह सारा विवरण इतिहास में आसानी से
उपलब्ध है। मोहम्मद गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ने दिल्ली में कदम रखते ही सबसे
पहले इन मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। जल्दबाजी में उसी सामग्री से मस्जिद खड़ी
कर दी गई। उसे नाम दिया गया कुव्वत-उल-इस्लाम यानी इस्लाम की ताकत। इसके निर्माण
का मकसद इबादत से ज़्यादा स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना और
उनके सामने इस्लाम की ताकत दिखाना था। मंदिरों को तोड़ने और उस पर मस्जिद खड़ी करने
की बात खुद कुतुबुद्दीन के दरबारी लेखकों ने लिखी है। 13वीं सदी के विदेशी यात्री
इब्न बतूता से लेकर अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भी यह तथ्य लिखा है। यहां तक कि इमारत
के बाहर लगा भारतीय पुरातत्व सर्वे का बोर्ड भी यही कहता है कि उसे 27 हिंदू-जैन
मंदिरों को तोड़ कर बनाया गया है। 1914 में भारतीय पुरातत्व विभाग की तरफ से इमारत
के अधिग्रहण को भी याचिका में





