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- पतंग उड़ाने का मकर संक्रांति के दिन से क्या है संबंध,क्या है धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व....?
Posted by : achhiduniya
13 January 2021
हिन्दू धर्म के वैदिक शास्त्रों के अनुसार, मकर राशि शनि देव के स्वामित्व वाली राशि
है, ऐसे में ये
माना जाता है कि इस दिन पिता सूर्य, अपने पुत्र शनि के घर में प्रवेश करते हैं, जहां पिता-पुत्र का मिलाप होता है। इसके
साथ ही इस दिन से ही सूर्य देव उत्तरायण हो जाते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को
विशेष रूप से देवताओं का दिन माना जाता है, जबकि दक्षिणायन को देवताओं की रात से
संबोधित किया जाता है। ऐसे में सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से ही, हिंदू धर्म में शुभ व मांगलिक क्रिया-कार्य
की शुरुआत होती है। भारतवर्ष में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग नामों से जाना
जाता है, जैसे
दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में मकर संक्रांति के दिन पोंगल का पर्व मनाया जाता है। वहीं
उत्तर-पूर्वी राज्य असम में, इसी दिन भोगाली-बिहु मनाए जाने का विधान है। बिहार में मकर
संक्राति को खिचड़ी कहा जाता है, जबकि देश के कई अन्य राज्यों में इसे उत्तरायणी के नाम से भी
मनाया जाता है। मकर संक्रांति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के दूसरे पड़ोसी देश जैसे
नेपाल, श्रीलंका
में भी बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति को पंतग पर्व भी कहा जाता है। मकर संक्रांति के
अवसर पर बाजार रंग-बिरंगे पतंगों से सजे नजर आने लगते हैं। आसमान में पतंगे खूब
उड़ती हुई दिखती हैं,लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस पर्व का पतंगबाजी
के साथ क्या रिश्ता है। मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का रिश्ता भगवान राम से भी है।
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों महत्व हैं। धार्मिक महत्व की बात करें तो इसका संबंध भगवान
राम से बताया जाता है। ऐसा माना जाता है
भगवान राम ने मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की शुरुआत की थी। तमिल की
तन्दनानरामायण के मुताबिक भगवान राम ने जो पतंग उड़ाई वह इन्द्रलोक में चली गई थी।
भगवान राम द्वारा शुरू की गई इसी परंपरा को आज भी निभाया जाता है। वहीं वैज्ञानिक
कारण की बात करें तो पतंग उड़ाने का संबंध स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। क्योंकि
पतंग उड़ाने से कई व्यायाम एक साथ हो जाते हैं। सर्दियों की सुबह पतंग उड़ाने की
शरीर को ऊर्जा मिलती है और त्वचा संबंधी विकार दूर होते हैं। इस दिन कई राज्यों में लोग पतंगबाजी
समारोह के साथ मकर संक्रांति का उत्सव मनाते हैं। मांगलिक कार्यो कि शुरुवात व खेतो
में नई फसल कि खुशी को जाहीर करने के लिए पतंगबाजी कर
पेंच लड़ाए जाते है। मकर
संक्रांति के दिन लोग अच्छी फसल के लिए, ऊर्जा देने वाले एकमात्र प्रत्यक्ष देवता सूर्य को
धन्यवाद करते हैं। यही कारण है की इस दिन पवित्र नदियों, कुण्ड और तालाबों में स्नान करने का विशेष
महत्व होता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन किसी भी पवित्र नदियों में
स्नान कर दान-पुण्य करता है, उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपने सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। श्रीमद्भागवत
गीता के अनुसार, महाभारत काल में भीष्म पितामह ने भी मकर संक्रांति के दिन को ही
अपनी देह त्याग करने के लिए चुना था। वहीं
वैदिक शास्त्रों के अनुसार, ज्यादातर हिंदू त्योहारों की गणना चंद्रमा पर आधारित पंचांग के
द्वारा की जाती है,लेकिन मकर संक्रांति पर्व सूर्य पर आधारित पंचांग की गणना से
मनाया जाता है। इसी दिन से ऋतु में परिवर्तन होने लगता है, साथ ही शरद ऋतु क्षीण होने लगती है और
बसंत का आगमन शुरू हो जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप, भारत में दिन लंबे और रातें छोटी हो जाती
हैं।





