Posted by : achhiduniya 09 November 2022

इंसानी स्वभाव की कमजोरी का फायदा उठाकर कंपनियां, अभी खरीदो बाद चुकाओ का लालच देती हैं,यदि आप अपने खर्च को कंट्रोल करना चाहते हैं तो क्रेडिट कार्ड का उपयोग ना करें और जिस वक्त जो सामान खरीदें उसी समय उसका पेमेंट करें। बिहेवियर इकोनॉमिक्स हमें बताता है कि इंसानों के लिए हर पैसे का रंग अलग होता है। तनख्वाह में मिले पैसे किफायत से खर्च किए जाते हैं, जबकि बोनस के मामले में फिजूलखर्ची चल जाती है। पैसों के मामले में लोग सिर्फ दिमाग से फैसले नहीं लेते,अक्सर इंसानी जज्बात दिमाग पर हावी हो जाते हैं, इसलिए आर्थिक मामलों को समझने के लिए अर्थशास्त्र के साथ मनोविज्ञान को समझने की भी जरूरत है। 
यही बिहेवियरल इकोनॉमिक्स कहलाता है। बिहेवियर इकोनॉमिक्स की नज थ्योरी  कहती है कि लोगों के फैसलों को सिर्फ कानून या सजा का डर दिखाकर नहीं बल्कि नज यानी कि सुझाव या प्रोत्साहन के जरिए भी बदला जा सकता है। मान लीजिए क्रेडिट कार्ड से पैसा चुकाते वक्त हर बार मोबाइल पर एक संदेश आए कि क्या आप सचमुच में खर्च करना चाहते हैं ? तो आप कुछ कुछ खरीदारी स्थगित कर देंगे। यह और बात है क्रेडिट कंपनियां कभी ऐसा नहीं करतीं बल्कि वह चाहती हैं कि आप 


बेवजह खर्च करें, डिफ़ॉल्ट करें ताकि आप पर पैनल्टी लगाकर वे प्रॉफिट कमा सकें। किसी बुफे में लोग वहीं डिश उठाएंगे जो उनके आंखों के ऊंचाई पर रखी हो। नज थ्योरी के मुताबिक यदि किसी फार्म को भरते वक्त आप लोगों से किसी खास बात के लिए हां करवाना चाहते हैं तो उनसे पूछने के बजाय पहले आप उनकी हां को मान लीजिए डिफ़ॉल्ट चॉइस और फिर पूछिए यदि आप इस योजना में 

शामिल नहीं होना चाहें तो बॉक्स में टिक लगाएं। इंसानी स्वभाव है कि वह कुछ नहीं करना चाहता। इस तरह अधिक लोग हां कर बैठेंगे। इन दिनों सरकारें इस नज का इस्तेमाल  लोगों के बैंक खातों से बीमा की रकम काटने में कर रही हैं। बीमा करवाने के लिए अलग से हां नहीं करवाई जाती। उसे डिफॉल्ट चॉइस मान लिया जाता है। इस तरह के नज के इस्तेमाल को कई लोग गलत भी मानते हैं। यह लोगों की मानवीय कमजोरी का फायदा उठा कर उनके चुनने के अधिकार का हनन करने जैसा है। विद्वान मानते हैं कि पैसे को जब हम अपनी जेब से जुदा करते हैं,तो हमें तकलीफ होती है। यह तकलीफ तब ज्यादा होती है,जब हम नोटों की शक्ल में पैसा दे रहे हों। क्रेडिट कार्ड या उधार माल खरीदते वक्त यह तकलीफ कम हो जाती है। यही कारण है किस्तों में उधार सामान खरीदते या क्रेडिट कार्ड के जरिए खर्च करते वक्त लोग कई बार गैर जरूरी चीजें खरीद लेते हैं। मतलब कि यदि टाइम ऑफ पेमेंट और टाइम ऑफ परचेस को अलग कर दिया जाए तो यह तकलीफ कम हो जाती है।

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