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- समलैंगिक जोड़े द्वारा बच्चा गोद लेने व समलैंगिक विवाह विवाद कानून पर चर्चा करेगा कोर्ट....
Posted by : achhiduniya
17 April 2023
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग {एनसीपीसीआर} ने कहा है कि समलैंगिक जोड़े
द्वारा बच्चों को गोद लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।एनसीपीसीआर ने कहा है कि समान लिंग वाले अभिभावक द्वारा पाले गए बच्चों की
पहचान की समझ को प्रभावित कर सकते है। इन बच्चों का एक्सपोजर सीमित रहेगा और उनके समग्र
व्यक्तित्व विकास पर असर पड़ेगा। दिल्ली सरकार के बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी
दाखिल कर समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं के साथ सुनवाई
की
मांग की है। डीसीपीसीआर ने कहा है कि समलैंगिक जोड़ों को भी बच्चे गोद लेने की
अनुमति मिलनी चाहिए। इसके लिए याचिका में अलग-अलग तर्क दिए गए हैं। इसमें कहा गया
है कि विषमलिंगी जोड़ों की तरह ही समलैंगिक जोड़े भी अच्छे या बुरे अभिवावक बन
सकते हैं। इनका तर्क है कि दुनिया के 50 से
ज्यादा देश समलैंगिक जोड़ों को बच्चा गोद लेने की इजाजत देते हैं। कोर्ट में दायर
याचिका में कानूनी समस्याओं पर भी दलील रखी गई है। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से मौजूदा कानूनों
पर ज्यादा असर
नहीं पड़ेगा। मौजूदा गोद लेने के कानून पुरानी मान्यताओं और धारणाओं
पर आधारित हैं। वर्तमान समय से उनका नाता नहीं है। समलैंगिक जोड़ों में लिंग के
आधार पर भेदभाव नहीं होता है, ऐसे में अलगाव के वक्त गुजारा
भत्ता तय करने, बच्चे के कस्टडी लेने में पति पत्नी वाला विवाद
नहीं रहेगा। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की याचिकाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट
केंद्र सरकार की आपत्ति जताने वाली अर्जी पर सुनवाई को तैयार हो गया है। एनसीपीसीआर
के साथ अब गुजरात, मध्य प्रदेश सरकारों ने भी सुप्रीम कोर्ट में
अर्जी दाखिल की है। अब केंद्र, गुजरात और एमपी और एनसीपीसीआर ने मंगलवार को अर्जियों पर भी सुनवाई
की मांग की है। इस पर सुप्रीम
कोर्ट ने सहमति जता दी है। इन सभी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर समलैंगिक
विवाह को मान्यता देने का विरोध किया है। केंद्र ने कहा है कि ये संसद का अधिकार क्षेत्र
है न कि सुप्रीम कोर्ट का। कोर्ट में सरकार की ओर से दलील दी गई है कि हिंदू लॉ के
अनुसार भी सेमसेक्स में शादी अमान्य है। साथ ही यह हिंदू कानून के नियमों में
सन्निहित है। यहां तक कि इस्लाम भी शादी जो कि एक प्रकार का अनुबंध है, वहां पर भी केवल पुरुष और महिला में भी यह संभव है। कुल मिलाकर
केंद्र ने कहा कि हिंदू लॉ और मुस्लिम लॉ में भी समलैंगिक विवाह की इजाजत नहीं है। यह पवित्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों
के संविधान पीठ को 18 अप्रैल को सुनवाई करनी है।
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