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विपक्ष का रेवड़ी कल्चर बीजेपी को रख दे न 2024 में कुचलकर,लड़खड़ाती भाजपा को 2024 में गठबंधन की बैसाखी का सहारा..
Posted by : achhiduniya
08 June 2023
2014 में नरेंद्र मोदी का जादू जनता के सर चड़कर बोलता था। समय बीतने के साथ
सरकार जनता की आशाओ पर खरी न उतरने के चलते कई राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा
जिसमें बीते चुनावों में पश्चिम बंगाल,पंजाब और हाल में कर्नाटक में मिली करारी हार
के चलते भाजपा को सोचने पर मजबूर कर दिया। विपक्षी पार्टियों का रेवड़ी कल्चर बीजेपी
को 2024 में कुचल कर न रख दे। इस बात पर भी चिंतन करना जरुरी है। वही भाजपा से नाराज सहयोगी
दल ही कहीं भाजपा की लुटिया न डुबो दे। 2019 के बाद एनडीए के कई
नए और
पुराने सहयोगी बीजेपी का साथ छोड़ चुके हैं। इनमें शिवसेना, जेडीयू
और शिरोमणि अकाली जैसे प्रमुख दल भी है। केंद्र में सरकार होने और विपक्षी एकता की
कवायद के बीच एनडीए का बिखराव ने कई गुत्थियों को उलझा दिया है। 2014 में
भी बीजेपी एनडीए बनाकर चुनावी मैदान में उतरी, लेकिन बीजेपी को मिले पूर्ण
बहुमत के बाद एनडीए के दलों में उथल-पुथल शुरू हो गया। कई दलों ने आरोप खुद की
उपेक्षा का भी आरोप लगाया। शिवसेना और जेडीयू जैसी पुरानी पार्टियों ने खुद को
कमजोर करने का भी आरोप लगाया।
2019 के
बाद तो एनडीए में भगदड़ सी मच गई। पीएमके को छोड़ दिया जाए तो 1998 में
सहयोगी रहे एक भी दल अब एनडीए का हिस्सा नहीं है। हालांकि, 1998 की
तुलना में एनडीए का जनाधार जरूर बढ़ा है। खुद बीजेपी 10 राज्यों
की सत्ता पर काबिज है। 6 राज्यों में सहयोग से सरकार चला रही है। शिरोमणि अकाली दल
और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने कृषि बिल के खिलाफ सरकार का साथ छोड़ दिया। इन
दलों का कहना था कि बिल बनाने से पहले सहयोगी दलों से चर्चा नहीं की गई यानी
बीजेपी ने बड़े मुद्दों पर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की अनदेखी की। शिअद और राएलपी का
किसानों के बीच जनाधार माना जाता रहा है। हालांकि, बाद में आंदोलन के आगे मोदी
सरकार झुक गई और यह कानून वापस ले लिया गया।
2014 के बाद 2019 के
चुनाव में भी बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला, जिसके बाद गठबंधन की राजनीति
कमजोर पड़ गई। बीजेपी ने सरकार में सहयोगी दलों के प्रतिनिधित्व के बदले सांकेतिक
भागीदारी दी। इससे कई सहयोगी दल नाराज हो गए। जेडीयू ने तो सरकार में शामिल होने से ही इनकार
कर दिया। इतना ही नहीं कॉमन मिनिमम प्रोग्राम और
मुद्दों में भी सहयोगी दलों को तरजीह नहीं मिली। कई दलों ने इसको वजह बताते हुए
गठबंधन से किनारा कर लिया। महाराष्ट्र, असम
और हरियाणा में बीजेपी ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। ऐसे में इन तीन राज्यों में
चुनाव का वोट फीसदी से सब कुछ तय होगा।
कमजोर होने की वजह से बीजेपी असम, बिहार, पश्चिम
बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा
और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गठबंधन बनाने की पहल की थी। इन राज्यों में लोकसभा की करीब 150 सीटें
हैं। गठबंधन टूटने की स्थिति में करीब इतने ही सीटों पर इसका असर हो सकता है।