Posted by : achhiduniya 29 June 2023

समान नागरिक संहिता यानी सभी धर्मों के लिए एक ही कानून। अभी होता ये है कि हर धर्म का अपना अलग कानून है और वो उसी हिसाब से चलता है। भारत में आज भी ज्यादातर धर्म के लोग शादी, तलाक और जमीन जायदाद विवाद जैसे मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं। जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। समान नागरिक संहिता को अगर लागू किया जाता है तो सभी धर्मों के लिए फिर एक ही कानून हो जाएगा यानि जो कानून हिंदुओं के लिए होगा, वही कानून मुस्लिमों और ईसाइयों पर भी लागू होगा। अभी हिंदू बिना तलाक के दूसरे शादी नहीं कर सकते, जबकि मुस्लिमों को तीन शादी करने की इजाजत है। समान नागरिक संहिता आने के बाद सभी पर एक ही कानून होगा
चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या मजहब का ही क्यों न हो। बता दें कि अभी भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान आपराधिक संहिता है, लेकिन समान नागरिक कानून नहीं है। भारतीय संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ.भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि हमारे पास पूरे देश में एक समान और पूर्ण आपराधिक संहिता है।


ये दंड संहिता और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में शामिल है। साथ ही हमारे पास संपत्ति के हस्तांतरण का कानून है, जो संपत्ति और उससे जुड़े मामलों से संबंधित है। ये पूरे देश में समान रूप से लागू है।  उन्‍होंने संविधान सभा में कहा कि मैं ऐसे कई कानूनों का हवाला दे सकता हूं, जिनसे साबित होगा कि देश में व्यावहारिक रूप से समान नागरिक संहिता है। इनके मूल तत्व समान हैं और पूरे देश में लागू हैं। डॉ.आंबेडकर ने कहा था कि सिविल कानून विवाह और उत्तराधिकार कानून का उल्लंघन करने में सक्षम नहीं हैं।


23 नवंबर 1948 को डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा की बहस में समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार दलीलें दी थीं। डॉक्टर आंबेडकर ने आगे कहा था, शरियत ऐक्ट 1937 से पहले देश के तमाम हिस्सों में मुस्लिमों पर हिंदू कानून ही लागू होता था। उत्तराधिकार के मामले में यूनाइटेड प्रॉविंस, सेंट्रल प्रॉविंस और बॉम्बे जैसे तमाम हिस्सों में मुस्लिमों पर भी हिंदू कानून लागू होता था। यहां तक कि उत्तराधिकार से जुड़ा मरुमक्कथायम सिस्टम (एक मातृसत्तात्मक सिस्टम) कई दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रचलित था जो हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिमों पर भी लागू था।  समान नागरिक संहिता का जिक्र 1835 में ब्रिटिश सरकार की एक रिपोर्ट में भी किया गया था। 

इसमें कहा गया था कि अपराधों, सबूतों और ठेके जैसे मुद्दों पर समान कानून लागू करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में हिंदू-मुसलमानों के धार्मिक कानूनों से छेड़छाड़ की बात नहीं की गई है। हालांकि, 1941 में हिंदू कानून पर संहिता बनाने के लिए बीएन राव समिति का गठन किया गया। राव समिति की सिफारिश पर 1956 में हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों के उत्तराधिकार मामलों को सुलझाने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम विधेयक को अपनाया गया। हालांकि, मुस्लिम, ईसाई और पारसियों लोगों के लिए अलग कानून रखे गए थे। 




भारत में अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता है तो लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ा दी जाएगी। इससे वे कम से कम ग्रेजुएट तक की पढ़ाई पूरी कर सकेंगी। गांव स्‍तर तक शादी के रजिस्ट्रेशन की सुविधा पहुंचाई जाएगी। अगर किसी की शादी रजिस्टर्ड नहीं होगी तो दंपति को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा। पति और पत्‍नी को तलाक के समान अधिकार मिलेंगे। एक से ज्‍यादा शादी करने पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। नौकरीपेशा बेटे की मौत होने पर पत्‍नी को मिले मुआवजे में माता-पिता के भरण पोषण की जिम्‍मेदारी भी शामिल होगी। 
उत्‍तराधिकार में बेटा और बेटी को बराबर का हक होगा। पत्‍नी की मौत के बाद उसके अकेले माता-पिता की देखभाल की जिम्‍मेदारी पति की होगी। मुस्लिम महिलाओं को बच्‍चे गोद लेने का अधिकार मिल जाएगा। उन्‍हें हलाला और इद्दत से पूरी तरह से छुटकारा मिल जाएगा। लिव-इन रिलेशन में रहने वाले सभी लोगों को डिक्लेरेशन देना पड़ेगा। पति और पत्‍नी में अनबन होने पर उनके बच्‍चे की कस्‍टडी दादा-दादी या नाना-नानी में से किसी को दी जाएगी। बच्‍चे के अनाथ होने पर अभिभावक बनने की प्रक्रिया आसान हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट और देश के अलग-अलग हाई कोर्ट ने समय-समय पर कई बार समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर जोर दिया है।


चर्चित शाह बानो केस में अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की थी।

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