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- क्या निकाह नामें में होती है तलाक-हलाला संबंधित शर्ते,जाने मुगल राज व आज के मौलवी राज द्वारा.....?
Posted by : achhiduniya
13 September 2023
भारत में भी
पिछले कुछ सालों में तीन तलाक से लेकर हलाला और हिजाब जैसे मुद्दे खूब चर्चा में
रहे। तलाक को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग नियम हैं, खासतौर पर मुस्लिम देशों में इसे लेकर
अपने नियम बनाए गए हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुगलों के दौर में तलाक को लेकर क्या नियम
थे?#
निकाह:-इस्लाम में विवाह की व्यवस्था एक चेक ऐंड बैलेंस
के आधार पर है जहाँ निकाह एक अनुबंध (एग्रीमेंट) होता है जिसमें लड़के और लड़की की
रजामंदी ली जाती है,लड़की के बाप को यह अधिकार है कि वह अपनी बेटी के भविष्य की
सुरक्षा के लिए कोई भी मेहर देन निर्धारित कर सकता है और इसकी ज़रूरत
भी इसीलिये है कि यदि निकाह
(एग्रीमेंट) टूटा तो मेहर उस लड़की के भविष्य को
सुरक्षित करेगा। यह सब कुछ लिखित में होता है और इसके दो गवाह और एक वकील होते हैं जो सामान्यतः लड़की वालों की तरफ से रहते हैं जिससे कि लड़की के साथ अन्याय ना हो, धोखा ना हो, सब तय होने के बाद सबसे पहले लड़की से निकाह पढ़ाने की इजाज़त उन्ही वकील और गवाहों के सामने ली जाती है और यदि लड़की ने इजाजत देकर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर दिया तब निकाह की प्रक्रिया आगे बढ़ती है नहीं तो
वहीं समाप्त, सब कुछ सर्वप्रथम
लड़की के निर्णय पर ही आधारित होता है. लड़की की इजाज़त के बाद पूरे बारात और महफिल में "मेहर की
रकम" को एलान करके सभी शर्तों गवाहों और वकील की उपस्थिति में निकाह पढाया
जाता है जो अब लड़के के उपर है,कि वह कबूल करे या ना करे, यदि इन्कार कर दिया तो मामला खत्म परन्तु निकाह कबूल कर लिया तो फिर उस एग्रीमेंट पर वह हस्ताक्षर करता है और सभी गवाह वकील और निकाह पढ़ाने वाले मौलाना हस्ताक्षर करके एक एक प्रति दोनो पक्षों को दे देते हैं और इस तरह निकाह की एक प्रक्रिया पूरी होती है। ध्यान रहे की लड़की को मिलने वाले मेहर की रकम तुरंत बिना विलंब के मिलना चाहिए
और बिना उसका मेहर दिये उस लड़की को छूने का भी अधिकार उस लड़के
को नहीं है और लड़की के उस मेहर पर उसके पति का भी अधिकार नहीं है, वह उस लड़की की
अपनी भविष्यनिधि है।# तलाक:- निकाह के बाद जीवन में यदि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं कि साथ जीवन जीना मुश्किल है तो आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया अपनाई जाती है जो तीन चरण में होती है, पहले तलाक के बाद दोनों के घर वाले सुलह सपाटे का प्रयास करते हैं और पति-पत्नी में जो कोई भी समस्या हो उससे सुलझा कर वैवाहिक जीवन सामान्य कर देते हैं, अक्सर मनमुटाव या कोई कड़वाहट आगे के भविष्य की परेशानियों को देखकर दूर हो ही जाती है और यदि नहीं हुई और लगा
कि अब जीवन साथ संभव नहीं तो दूसरा तलाक दिया जाता है पर वह भी दोनो की
सहमति से ही। दूसरे तलाक के बाद गवाह वकील या समाज के अन्य असरदार लोग बीच
बचाव करते हैं और जिसकी भी गलती होमामले को सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं, अक्सर अंतिम चेतावनी देखकर और बिछड़ने के डर से वैवाहिक जोड़े गलतफहमी दूर कर लेते हैं या समझौता कर लेते हैं और यदि सब सामान्य हो गया तो फिर से दोनो में निकाह उसी प्रकिया के अनुसार होता है क्योंकि दो तलाक के बाद निकाह कमज़ोर हो जाता है। यदि सुलह समझौता नहीं हुआ तो अंतिम और तीसरा तलाक देकर संबंध समाप्त कर दिया जाता है। इस तीन तलाक की सीमा लगभग 2•5 महीने होती है
अर्थात लड़की के
तीन माहवारी की अवधि और पहला तलाक पहली माहवारी, दूसरा तलाक दूसरी
माहवारी तथा तीसरा तलाक इसी तरह तीसरी माहवारी के बाद दिया जाता है, वह इसलिए होती है कि अक्सर बच्चे की संभावना दोनों में प्रेम को पुनः पैदा कर सकती है और अलग होने
का फैसला बदला जा सकता है। ध्यान रखें कि इस्लाम अंतिम समय तक विवाह ना टूटने की
संभावना को जीवित रखता है। सामान्यतः तलाक के बाद लड़की अपने माँ बाप के यहाँ जाती है और
"इद्दत" का तीन महीना 10
दिन बिना किसी नामहरम (पर पुरुष) के सामने आए पूरा करती है।
संघी साहित्य इसे औरतों के ऊपर इस्लाम का अत्याचार बताता है जबकि इसका आधार यह है
कि यदि वह लड़की या महिला गर्भ से है तो वह शारीरिक रूप से स्पष्ट होकर पूरे समाज
के सामने आ जाए और ना उस महिला के चरित्र पर कोई उंगली उठा पाए और नाही उसके नवजात
शिशु के नाजायज़ होने पर इद्दत की अवधि पूरी होने के बाद वह लड़की अपना जीवन अपने
हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र है और अक्सर ऐसी तलाक शुदा लड़कियों का पुनः विवाह
खानदान के लोग कुछ महीनों अथवा साल दो साल में करा ही देते हैं और इसी छोटी अवधि
में उसे निकाह मे मिले मेहर का धन उपयोग में आता है। # हलाला:- तलाक की
प्रक्रिया इतनी सुलझी हुई और समझौतों की गुंजाइश समाप्त करते हुए है
कि तलाक के
बाद पुनः विवाह की गुंजाइश नहीं रहती क्युँकि बहुत कड़वाहट लेकर संबंध टूटते हैं।
एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते अलग होने वाले तो पुनः विवाह का तो सोचना भी
असंभव है। एक और तरह का तलाक की संभावना होती है, वह होती है
जल्दबाजी में या बिना सोचे समझे हवा हवाई तरीके से तलाक दे देना या पति पत्नी की
छोटी मोटी लड़ाई में तलाक दे देना , या गुस्से में
आकर तलाक दे देना। सामान्यतः ऐसी स्थिति में पति-पत्नी में प्रेम और आपसी समझ तो
होती है पर क्षणिक आवेश में आकर पुरुष तलाक दे देते हैं. लोग ऐसा ना करें और इसे ही रोकने के लिए हलाला की व्यवस्था की
गई है कि जब गलती का एहसास हो तो समझो कि तुमने क्या खोया है और जीवन भर घुट घुट कर रहो क्युँकि हलाला वह रोक पैदा करता है
कि गलती का एहसास होने पर फिर कोई उसी पत्नी से विवाह ना कर सके।
ध्यान दीजिए कि हलाला
तलाक को रोकने का एक ऐसा बैरियर है जिसे सोचकर ही पुरुष तलाक के बारे में सोचना ही
बंद कर देता है अन्यथा तलाक और फिर से शादी की घटनाओं की बाढ़ आ जाए और तलाक एक
मजाक बन कर रह जाए। हलाला मुख्य रूप से महिलाओं की इच्छा के उपर निर्भर एक
प्रक्रिया है जिसमे वह तलाक के बाद अपनी मर्जी से खुशी खुशी किसी और बिना किसी
पूर्व योजना के अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है और फिर दूसरे विवाह में भी ऐसी परिस्थितियाँ
पैदा होती हैं कि यहाँ भी निकाह,
तलाक की उसी प्रक्रिया के अनुसार टूट जाता है तब ही वह इद्दत की
अवधि के बाद पूर्व पति के साथ पुनः निकाह कर सकती है वह भी उसकी अपनी खुशी और
मर्जी से,हलाला इसलिए नहीं
कि कोई पुर्व पति से विवाह करने के उद्देश्य के
लिए किसी अन्य से विवाह करके तलाक
ले और यदि कोई ऐसा सोच कर करता है तो वह गलत है गैर इस्लामिक है और
हलाला का दुस्प्रयोग है। यह सारी (निकाह,तलाक, हलाला) प्रक्रिया
स्त्रियों के निर्णय के उपर होता है और इसके लिए उस महिला पर कोई ज़बरदस्ती नहीं
कर सकता और कम से कम हर समाज की महिला तो ऐसी ही होती है कि वह बार बार पुरुष ना
बदलें। मुगलों के दौर में निकाहनामे के कई नियम थे। जिसमें पहला नियम ये था
कि मौजूदा बीवी के रहते हुए शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता है। शख्स अपनी बीवी से
लंबे समय तक दूर नहीं रह सकता है और उसे अपनी बीवी को गुजारा भत्ता देना होगा। शौहर
किसी दासी को अपनी पत्नी के रूप में नहीं रख सकता है।
अगर तलाक की बात करें तो
बादशाह जहांगीर के एक फैसले का खूब जिक्र होता है। जहांगीर ने पत्नी की गैर
जानकारी में शौहर की तरफ से तलाक की घोषणा को अवैध करार दिया था। उस दौर में भी
पत्नी की तरफ से खुला या तलाक दिया जाता था। इसके अलावा निकाहनामे की शर्तों के
टूटने पर शादी को खत्म घोषित किया जा सकता था। मुगलों के दौर में गरीबों में जब
शादी होती थी तो जुबानी वादे ही माने जाते थे,अगर इन वादों का शौहर ने पालन नहीं
किया तो ये तलाक का एक कारण बन सकता था। शादी खत्म होने की सूरत में बीवी को भत्ते
देने की शर्त भी रखी जाती थी। हालांकि शाही परिवार को निकाह और तलाक के लिए असीमित
अधिकार दिए गए थे। कई बार देखा गया कि शाही परिवार के किसी सदस्य के लिए पूरी
प्रक्रिया तीन तलाक से भी तेजी से पूरी कर दी गई।
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