Posted by : achhiduniya 17 June 2024

इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी यानि आईआरडीएआई (IRDAI) ने इंश्योरेंस से जुड़े नियमों में इस साल कुछ बदलाव किए। इंश्योरेंस के ज्यादातर सेक्टर्स में ये बदलाव किए गए और ये नियम इसी साल अप्रैल महीने से लागू भी किए जा चुके हैं। इंश्योरेंस बीमा कंपनी और किसी शख्स के बीच एक कॉनट्रैक्ट है। इस कॉन्ट्रेक्ट के तहत बीमा कंपनी शख्स से एक फिक्स अमाउंट जिसे प्रीमियम कहते हैं वो लेती है और शख्स को पॉलिसी की शर्तों के हिसाब से हर्जाना दिया जाता है। लाइफ इंश्योरेंस तो लंबे वक्त से चलन में था, धीरे-धीरे अलग-अलग तरह के इंश्योरेंस लोगों को पसंद आने लगे। इंश्योरेंस से जुड़े नियम-कानूनों की वजह से कई बार लोग इंश्योरेंस 
लेने से कतरा भी जाते हैं,लेकिन नियमों में बदलाव हुए ही इसलिए हैं ताकि इंश्योरेंस को और ज्यादा कस्टमर फ्रेंडली बनाया जा सके,तो अगर आपने कोई इंश्योरेंस लिया है और कोई इंश्योरेंस लेने की प्लानिंग कर रहे हैं तो नियमों को जरुर ध्यान में रखें। पहले हम जानेंगे कि इंश्योरेंस यानि बीमा कितने तरह का होता है। तो इसका जवाब है दो तरह का. एक जीवन बीमा मतलब लाइफ इंश्योरेंस और दूसरा साधारण बीमा यानि जनरल इंश्योरेंस। जीवन बीमा के तहत बीमा पॉलिसी खरीदने वाले व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके नॉमिनी को बीमा कंपनी की तरफ से मुआवजा मिलता है,जो शख्स पॉलिसी लेता है वो पहले ही अपना नॉमिनी तय रखता है और उसके बाद बीमा के पैसे नॉमिनी को ही मिलते हैं। दूसरी तरफ जनरल इंश्योरेंस में कार, हेल्थ, होम जैसे कई और तरह के बीमा होते हैं। 
इंश्योरेंस एक्सपर्ट कहते हैं बीमा एक कॉम्प्लिकेटेड चीज़ है। इसमें डॉक्यूमेंट्स बहुत बड़े होते हैं, जिन्हें पढ़ना और समझना थोड़ा मुश्किल होता है,अगर रेगुलेटर यानि आईआरडीआईए नियमों को आसान बनाता है तो कस्टमर का भरोसा बढ़ेगा। हो सकता है आने वाले समय में और बदलाव हों जिनसे इंश्योरेंस लेना आसान होगा। इस तरह के बदलाव से कस्टमर और कंपनी दोनों को फायदा होता है। आईआरडीएआई ने जो नियम जारी किए हैं उसके हिसाब से अब डाक्यूमेंट की कमी की वजह से क्लेम रिजेक्ट नहीं किया जा सकेगा।
बीमा कंपनी खुद ही हॉस्पिटल से बातचीत करके डॉक्यूमेंट लेगी और कस्टमर को जल्द से जल्द अपना क्लेम मिल जाएगा। हाल ही में जारी हुए सर्कुलर के हिसाब से क्लेम के लिए हां करते वक्त ही डॉक्यूमेंट मांगे जाने चाहिए। डॉक्यूमेंट्स में ड्राइविंग लाइसेंस, एफआईआर, फिटनेस रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, अनट्रेस रिपोर्ट, परमिट वगैरह होते हैं। बीमा पॉलिसी खरीदने के लिए अब एज लिमिट यानि आयु सीमा हटा दी गई है। पहले सिर्फ 65 साल की उम्र तक नई पॉलिसी खरीदी जा सकती थी, लेकिन अब 1 अप्रैल 2024 से लागू हुए नए नियमों के बाद कोई भी शख्स किसी भी उम्र में हेल्थ इंश्योरेंस ले सकता है। आईआरडीआई ने कहा कि अब हर एज ग्रुप के लिए कोई ना कोई पॉलिसी मौजूद होगी

और सीनियर सिटीजंस के लिए नई पॉलिसीज और उनके शिकायतों से निपटने के लिए अलग से इंतजाम किया जाएगा। इतना ही नहीं अब गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोग भी इंश्योरेंस पॉलिसी ले सकेंगे। अब कोई बीमा कंपनी किसी पॉलिसी को बेचते वक्त कोई जरुरी जानकारी छुपा नहीं सकेगी। उन्हें कस्टमर को एक इंफॉर्मेशन शीट देनी होगी जिसमें आसान भाषा में पॉलिसी से जुड़ी सभी जानकारी होगी। हेल्थ इंश्योरेंस के बाद जिस सेक्टर में ज्यादा बदलाव हुए वो है कार इंश्योरेंस.कार इंश्योरेंस में जो अहम बदलाव हुए हैं। उन में से एक ये है कि अब इंश्योरेंस के तहत ज्यादा बार क्लेम किया जा सकता है। पहले एक साल में दो बार ही क्लेम किया जा सकता था,लेकिन नियमों में बदलाव के बाद अब साल भर में ज्यादा बार क्लेम किया जा सकता है। साथ ही अब कस्टमर को हर बात की पूरी जानकारी देनी होती है। पॉलिसी के तहत कार के कौन-कौन से पार्ट कवर किए जाएंगे इसकी डिटेल इन्फॉर्मेशन देना जरुरी होता है। नए नियमों के मुताबिक आयुष उपचार से भी सब लिमिट्स हटा दी गई हैं। 

अब कस्टमर बीमा राशि के अमाउंट तक आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा प्रणालियों के जरिए हो रहे इलाज की लागत का दावा कर सकेंगे। इंश्योरेंस एक्सपर्ट का कहना है कि नए बदलाव पॉलिसी होल्डर्स के लिए बहुत उपयोगी हैं। उनका कहना था आयुष ट्रीटमेंट के लिए जब भी कंपनी क्लेम देती थी तब रूम रेंट डॉक्टर की फीस आदि पर एक लिमिट लगा देती थी। उदाहरण के लिए अगर कंपनी अपनी पॉलिसी में कहती है कि रूम रेंट एक परसेंट से ज्यादा नहीं होगाऐसे में अगर बिल तीन लाख है तो कंपनी आपको रोजाना के हिसाब से तीन हज़ार क्लेम देगी। इसमें अगर रूम रेंट पांच हज़ार का है तो बाकी के दो हज़ार कस्टमर को देने होंगे। अब इस सब लिमिट को हटा दिया गया है और अब पूरा अमाउंट क्लेम किया जा सकता है। हेल्थ इंश्योरेंस में कैशलेस पेमेंट के नियमों में भी बदलाव किया है।  अब बीमा कंपनी को जैसे ही मरीज के डिस्चार्ज होने की जानकारी मिलेगी तो उसके तीन घंटों के अंदर ही बीमा कंपनियों को अप्रूवल देना होगा और क्लेम सेटल हो जाएगा। कैशलैस ट्रीटमेंट में इलाज के लिए पॉलिसी होल्डर को कोई भुगतान नहीं करना होता,लेकिन पहले इंश्योरेंस कंपनी क्लेम एक्सेप्ट करने में काफी टाइम लेती थी। कई बार तो पॉलिसी होल्डर खुद ही बिल का भुगतान कर देता था या उसे ठीक होने के बाद भी अस्पताल में रुकना पड़ता था। नए नियमों के बाद आईआरडीएआई ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि कैशलेस इलाज के लिए 1 घंटे के भीतर अप्रूवल दिया जाए और क्लेम सेटलमेंट के लिए 3 घंटे में फाइनल अप्रूवल दे दिया जाए। अगर कंपनी इस तरह क्लेम सेटलमेंट नहीं करती तो हॉस्पिटल के एक्स्ट्रा खर्च का भुगतान कंपनी को ही करना होगा।

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