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- औध्योगिकी के चलते खेती पर मँडराता खतरा.....
Posted by : achhiduniya
19 July 2016
कारपोरेट
दुनिया पिछली सदी से ही खेती को किसी भी तरह के सम्मान से काटने की फिराक में रही
है। आधुनिक सभ्यता की इतिहास-गति उद्योगों के साथ आगे बढ़ रही है जबकि खेती के कदम
रुक गए हैं,इसलिए खेती एक निम्न पेशा है। पहली
और विकसित दुनिया से तिरस्कृत पेशा। एक इंस्टीट्यूट के अध्ययन के मुताबिक दुनिया
की 95 फीसदी खेतिहर आबादी अब सिर्फ एशिया और अफ्रीकी में
रहती है। भारत पर अपने निष्कर्षों को कुछ ज्यादा ही फोकस करते हुए बताया गया है कि
हिंदुस्तान में पिछले 30 सालों में खेती पर निर्भर आबादी की
बढ़ोत्तरी हुई है जबकि दुनिया के दूसरे हिस्सों में खेतिहर आबादी में जबर्दस्त कमी
आई है। लेकिन क्या जरूरत है कि हम उन्हीं के नजरिए से विकास की दुनिया देखें?
आखिर किसी भी नजरिए को मानने का एक सापेक्षवादी पैमाना होता है।
देखा जाए तो बड़े पैमाने में एशिया और अफ्रीका में जिंदगी और जीवन का पुराना भावनात्मक समीकरण जिंदा है। लोगों में निजी या पारिवारिक आत्मगौरव की भावना बची हुई है। अपनी निजता और महत्ता की सोच बची हुई है इसलिए खेती का यहां आज भी एक भावनात्मक पहलू है क्योंकि खेती के साथ एक आजादी का और निजी संपूर्णता का भाव जिंदा है जबकि अपने को औद्योगिक समाज की महज एक इकाई मान लेने वालों में यह आत्मगौरव नहीं है। ऐसे लोग खुद को देश की जनसंख्या रजिस्टर की महज एक संख्या मानने को तैयार रहते हैं। देश के करीब 75 फीसदी परिवार कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं। देश की लगभग 70 प्रतिशत गरीब आबादी (विश्व बैंक के मुताबिक 77 करोड़ लोग) गांव में बसती है।
लेकिन देश के जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जा रहा है। 50 के दशक में कृषि की हिस्सेदारी हमारी जीडीपी में 50 फीसदी से ज्यादा थी, 90 के दशक में यह 20 से 30 फीसदी रह गया और 2013-14 में यह हिस्सेदारी मात्र 13.9 फीसदी रह गई। 90 के दशक में नई थ्योरी अपने देश में प्रस्तुत की गई कि जीडीपी में कृषि का योगदान जितना कम होगा, अर्थव्यवस्था उतनी ही उन्नत होगी। इस समय हमारा जीडीपी है करीब 160 लाख करोड़ रुपए है। संस्थान के मुताबिक सन 1980 से 2011 के बीच यानी 31 सालों में भारत और चीन महज दो ही ऐसे देश हैं जहां खेतिहर आबादी में 50 फीसदी (भारत में) और 33 फीसदी (चीन में) की बढ़ोत्तरी हुई है नहीं तो दुनिया के तमाम विकसित समझे जाने वाले देशों में इस दरम्यान खेतिहर आबादी बड़ी तेजी से घटी है। इंस्टीट्यूट की रपट के मुताबिक इसी अवधि में अमेरिका की खेतिहर आबादी में जहां 37 फीसदी की कमी आई है, वहीं यूरोप में यह कमी 66 प्रतिशत तक दर्ज हुई है जिसका मतलब यह हुआ कि विकास के पहले पायदान में यूरोप है और दूसरे में अमेरिका, क्योंकि अब यहां से खेतिहर समाज लगभग विदा हो रहा है।
देखा जाए तो बड़े पैमाने में एशिया और अफ्रीका में जिंदगी और जीवन का पुराना भावनात्मक समीकरण जिंदा है। लोगों में निजी या पारिवारिक आत्मगौरव की भावना बची हुई है। अपनी निजता और महत्ता की सोच बची हुई है इसलिए खेती का यहां आज भी एक भावनात्मक पहलू है क्योंकि खेती के साथ एक आजादी का और निजी संपूर्णता का भाव जिंदा है जबकि अपने को औद्योगिक समाज की महज एक इकाई मान लेने वालों में यह आत्मगौरव नहीं है। ऐसे लोग खुद को देश की जनसंख्या रजिस्टर की महज एक संख्या मानने को तैयार रहते हैं। देश के करीब 75 फीसदी परिवार कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं। देश की लगभग 70 प्रतिशत गरीब आबादी (विश्व बैंक के मुताबिक 77 करोड़ लोग) गांव में बसती है।
लेकिन देश के जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जा रहा है। 50 के दशक में कृषि की हिस्सेदारी हमारी जीडीपी में 50 फीसदी से ज्यादा थी, 90 के दशक में यह 20 से 30 फीसदी रह गया और 2013-14 में यह हिस्सेदारी मात्र 13.9 फीसदी रह गई। 90 के दशक में नई थ्योरी अपने देश में प्रस्तुत की गई कि जीडीपी में कृषि का योगदान जितना कम होगा, अर्थव्यवस्था उतनी ही उन्नत होगी। इस समय हमारा जीडीपी है करीब 160 लाख करोड़ रुपए है। संस्थान के मुताबिक सन 1980 से 2011 के बीच यानी 31 सालों में भारत और चीन महज दो ही ऐसे देश हैं जहां खेतिहर आबादी में 50 फीसदी (भारत में) और 33 फीसदी (चीन में) की बढ़ोत्तरी हुई है नहीं तो दुनिया के तमाम विकसित समझे जाने वाले देशों में इस दरम्यान खेतिहर आबादी बड़ी तेजी से घटी है। इंस्टीट्यूट की रपट के मुताबिक इसी अवधि में अमेरिका की खेतिहर आबादी में जहां 37 फीसदी की कमी आई है, वहीं यूरोप में यह कमी 66 प्रतिशत तक दर्ज हुई है जिसका मतलब यह हुआ कि विकास के पहले पायदान में यूरोप है और दूसरे में अमेरिका, क्योंकि अब यहां से खेतिहर समाज लगभग विदा हो रहा है।


