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- सिर्फ गुरु का ज्ञान ही नहीं अपनी समझ भी जरूरी.......
Posted by : achhiduniya
19 July 2016
परीक्षा
में अच्छे अंक मिलने पर किसी स्टुडेंट को बाकी अन्य के मुकाबले कहीं अधिक
बुद्धिमान माना जाता है। एक सीमा तक यह सही भी है। श्रेष्ठता साबित करने का आखिर कोई
न कोई पैमाना तो होना चाहिए। इस दृष्टि से यह सही है। लेकिन यह महज एकेडमिक रिकार्ड
के हिसाब से सही होने से इंकार नहीं किया जा सकता। स्कूल या कॉलेज स्तर पर ही नहीं
जॉब पाने में भी इसकी अपनी अहमियत है। लेकिन इससे हटकर व्यक्तिगत, सामाजिक जीवन के साथ आपसी संबंधों में ही नहीं कार्यस्थल पर भी बौद्धिक
क्षमता से कहीं अधिक आपकी भावनाएं या फिर कहें आपकी सांवेगिक बुद्धि आपको कहीं
अधिक सफलता दिलाने में सहायक होती है। यहां आपके अंक नहीं, आपका
कौशल कहीं अधिक कामयाबी का पैमाना बन जाता है। यह माना जाता है कि पढ़ने-लिखने में
कहीं अधिक श्रेष्ठता हासिल करने वाले छात्र एकाकी अधिक होते हैं और उनके दोस्त भी
अन्य छात्रों की अपेक्षा काफी कम होते हैं।
यह कहा जा सकता है कि शैक्षिक संस्थान अच्छे अंक दिलाता है लेकिन पूरी जिंदगी के इम्तहान और बदलते परिवेश में जीने की सही राह दिखाने अंक ईक्यू (सांवेगिक बुद्धि) ही दिलाता है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में इसकी महत्ता अधिक बढ़ जाती है। आचार्य रजनीश ने अपने एक प्रवचन में एक अहम तथ्य अपने श्रोताओं के साथ साझा किया था, जिससे बुद्धिमत्ता और समझदारी के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है। रजनीश ने कहा था कि ब्रिटेन के एक महान गणितज्ञ को एक बार अपने परिवार के साथ कहीं जाने के लिए नदी को पार करना था। साथ में उनकी पत्नी और चार बच्चे भी थे। जाहिर है अपनी उम्र के लिहाज से सब बच्चों का कद अलग-अलग था। नदी की गहराई की उन्हें जानकारी नहीं थी। इसलिए अपने ज्ञान को महत्व देते हुए उन्होंने नदी पार करने के लिए पहले नदी की गहराई नाप लेना जरूरी समझा।
नदी की गहराई जान लेने के बाद उन्होंने अपने बच्चों की लंबाई नापी और उसका औसत निकालकर यह तय किया कि नदी की गहराई को उनके बच्चे पार कर लेंगे। लेकिन नदी में उतरने के साथ उनके दो छोटे बच्चे जिनकी लंबाई कम थी, डूबने लगे। निश्चित था कि वह महान गणितज्ञ आश्चर्यचकित हुआ कि आखिर यह कैसे हो गया? उस गणितज्ञ को इसका अहसास किस हद तक हुआ इसका खुलासा रजनीश ने नहीं किया है। लेकिन इस वाकये को सुनने और पढ़ने वालों के लिए यह एक सबक के साथ ही ज्ञान के उस व्यवहारिक पक्ष को भी समझना और जानना जरूरी है कि महज ज्ञान ही काफी नहीं होता। जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह आपकी अपनी निजी जिंदगी हो, सामाजिक जीवन हो या फिर आपके कार्यस्थल में सफलता पाने का मापदंड, वह खाली ज्ञान से नहीं हो सकता जो आप किताबों को पढ़कर प्राप्त करते हैं और जिंदगी के उस व्यावहारिक पक्ष को किसी कारण या फिर जाने-अनजाने नजरअंदाज कर देते हैं। यह माना जाता है कि युवावस्था तक ज्ञान हासिल करो, अनुभव वृद्धावस्था तक खुद-ब-खुद आ जाता है। लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी युग में ज्ञान और समझ दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत होती है। जॉब के कारण या फिर पारिवारिक कारणों से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ले रहे हैं। इसलिए जाहिर है महिलाओं के भी कामकाजी होने के कारण संयुक्तपरिवार में बड़े बुजुर्गो का अनुभव अब मिल पाना कठिन हो गया है।
सामाजिक बदलाव के कारण यह संभव भी नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि जो व्यक्ति चाहे वह उम्र के जिस पड़ाव पर हो, खासकर बुजुर्ग के अपने समय में देखे और समझे गए दायरे से निकल पाना मुश्किल होता है। ऐसे में टकराव की नौबत भी आ जाती है। लिहाजा यह आवश्यक हो जाता है कि खुद की समझ विकसित की जानी चाहिए जिससे इस प्रतिस्पर्धी युग में अपने को स्थापित और सफल बनाया जा सके। हम जो सजीव चीजें देखते हैं, उनकी उत्पत्ति तथा विविधता को समझने के लिए उनके विकास का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाले चार्ल्स डार्विन का यह वाक्य 'सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट' सही अर्थो में आपकी सफलता का वह पैमाना बताता है जो जीवन की सत्यता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम ही नहीं पूर्ण सत्य है। समय और परिस्थितियां बदलती रहती हैं और उस बदलाव में हमें खुद को साबित करना अनिवार्य हो जाता है। बदलाव के साथ खुद को फिट करना या फिर आत्मसात करने की कला ही समझदारी मानी जा सकती है।
यह कहा जा सकता है कि शैक्षिक संस्थान अच्छे अंक दिलाता है लेकिन पूरी जिंदगी के इम्तहान और बदलते परिवेश में जीने की सही राह दिखाने अंक ईक्यू (सांवेगिक बुद्धि) ही दिलाता है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में इसकी महत्ता अधिक बढ़ जाती है। आचार्य रजनीश ने अपने एक प्रवचन में एक अहम तथ्य अपने श्रोताओं के साथ साझा किया था, जिससे बुद्धिमत्ता और समझदारी के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है। रजनीश ने कहा था कि ब्रिटेन के एक महान गणितज्ञ को एक बार अपने परिवार के साथ कहीं जाने के लिए नदी को पार करना था। साथ में उनकी पत्नी और चार बच्चे भी थे। जाहिर है अपनी उम्र के लिहाज से सब बच्चों का कद अलग-अलग था। नदी की गहराई की उन्हें जानकारी नहीं थी। इसलिए अपने ज्ञान को महत्व देते हुए उन्होंने नदी पार करने के लिए पहले नदी की गहराई नाप लेना जरूरी समझा।
नदी की गहराई जान लेने के बाद उन्होंने अपने बच्चों की लंबाई नापी और उसका औसत निकालकर यह तय किया कि नदी की गहराई को उनके बच्चे पार कर लेंगे। लेकिन नदी में उतरने के साथ उनके दो छोटे बच्चे जिनकी लंबाई कम थी, डूबने लगे। निश्चित था कि वह महान गणितज्ञ आश्चर्यचकित हुआ कि आखिर यह कैसे हो गया? उस गणितज्ञ को इसका अहसास किस हद तक हुआ इसका खुलासा रजनीश ने नहीं किया है। लेकिन इस वाकये को सुनने और पढ़ने वालों के लिए यह एक सबक के साथ ही ज्ञान के उस व्यवहारिक पक्ष को भी समझना और जानना जरूरी है कि महज ज्ञान ही काफी नहीं होता। जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह आपकी अपनी निजी जिंदगी हो, सामाजिक जीवन हो या फिर आपके कार्यस्थल में सफलता पाने का मापदंड, वह खाली ज्ञान से नहीं हो सकता जो आप किताबों को पढ़कर प्राप्त करते हैं और जिंदगी के उस व्यावहारिक पक्ष को किसी कारण या फिर जाने-अनजाने नजरअंदाज कर देते हैं। यह माना जाता है कि युवावस्था तक ज्ञान हासिल करो, अनुभव वृद्धावस्था तक खुद-ब-खुद आ जाता है। लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी युग में ज्ञान और समझ दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत होती है। जॉब के कारण या फिर पारिवारिक कारणों से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ले रहे हैं। इसलिए जाहिर है महिलाओं के भी कामकाजी होने के कारण संयुक्तपरिवार में बड़े बुजुर्गो का अनुभव अब मिल पाना कठिन हो गया है।
सामाजिक बदलाव के कारण यह संभव भी नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि जो व्यक्ति चाहे वह उम्र के जिस पड़ाव पर हो, खासकर बुजुर्ग के अपने समय में देखे और समझे गए दायरे से निकल पाना मुश्किल होता है। ऐसे में टकराव की नौबत भी आ जाती है। लिहाजा यह आवश्यक हो जाता है कि खुद की समझ विकसित की जानी चाहिए जिससे इस प्रतिस्पर्धी युग में अपने को स्थापित और सफल बनाया जा सके। हम जो सजीव चीजें देखते हैं, उनकी उत्पत्ति तथा विविधता को समझने के लिए उनके विकास का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाले चार्ल्स डार्विन का यह वाक्य 'सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट' सही अर्थो में आपकी सफलता का वह पैमाना बताता है जो जीवन की सत्यता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम ही नहीं पूर्ण सत्य है। समय और परिस्थितियां बदलती रहती हैं और उस बदलाव में हमें खुद को साबित करना अनिवार्य हो जाता है। बदलाव के साथ खुद को फिट करना या फिर आत्मसात करने की कला ही समझदारी मानी जा सकती है।



