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- बिना युद्ध के ही 1600 जवान हर वर्ष मौत को गले लगा रहे हैं…
Posted by : achhiduniya
03 December 2017
एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में जवान
युद्ध के बगैर ही हर वर्ष अलग-अलग वजहों से अपनी जान गंवा रहे हैं। ताजा आंकड़ो के अनुसार
हर साल बिना युद्ध के ही 1600 जवान अपनी
जान गंवा देते हैं। सबसे अधिक जवान अपनी जान सड़क दुर्घटना या फिर आत्महत्या की वजह
से गंवाते हैं। युद्ध के मैदान में देश के लिए जवान अपना सबकुछ देश की रक्षा के लिए
दांव पर लगा देता है, वह देश की रक्षा के लिए अपनी जान की परवाह
भी नहीं करता है। लेकिन जब बिना युद्ध के ही कोई जवान अपनी जान गंवाता है तो वह ना
सिर्फ जवान के परिवार के लिए बल्कि पूरे देश को दुख देती है।
अधिकारी भी कर रहे हैं आत्महत्या जिस तरह से इतनी बड़ी संख्या में जवानों की मृत्यु हुई है। उस पर सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी चिंता जाहिर की है। सेना के एक अधिकारी का कहना है कि सेना प्रमुख को इस मुद्दे पर तुरंत ध्यान देना चाहिए, इसका समाधान निकाला जाना चाहिए। एक वरिष्ठ सेना अधिकारी का कहना है कि अगर रात में जरूरत नहीं है तो ड्राइविंग नहीं करने का निर्देश दिया गया है। वहीं नौकरी के दबाव में जो अधिकारी आत्महत्या कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर में जिस तरह से देश की सेना लगातार आतंकियों के खिलाफ अपना अभियान चला रही है।
उससे बड़ी संख्या में आतंकियों को मौत को गले लगाना पड़ा है, लेकिन आत्महत्या और सड़क हादसे में मारे गए जवानों की संख्या कश्मीर में आतंक विरोधी कार्रवाई शहीद हुए जवानों की संख्या से दोगुनी है। हाल के आंकड़ों पर नजर डालें तो सड़क दुर्घटना में हर वर्ष 350 जवानों की जान चली जाती है। वहीं 120 जवान आत्महत्या कर लेते हैं। जबकि ट्रेनिंग के दौरान स्वास्ध्य वजहों की वजह से भी कई जवानों की जान चली जाती है। सेना में कुल 41000 अधिकारी हैं, जबकि 11.32 लाख सैनिक हैं, एयरफोर्स में 12000 अधिकारी हैं, 1.3 लाक एयरमैन हैं, जबकि नेवी में 9000 अधिकारी है, 52000 सेलर हैं। 1947-48 में जम्मू कश्मीर में ऑपरेशन में कुल 1104 सैनिक शहीद हुए थे। 1962 में चीन युद्ध के दौरान 3250 जवान शहीद हुए, 1965 पाकिस्तान के युद्ध में 3264 जवान शहीद हुए, 1971 में बांग्लादेश लिबरेशन युद्द में 3843 जवान शहीद हुए, 1987 श्रीलंका में ऑपरेशन में 1157 जवान शहीद हुए, 1999 में कारगिल युद्ध में 522 जवान शहीद हुए।
अधिकारी भी कर रहे हैं आत्महत्या जिस तरह से इतनी बड़ी संख्या में जवानों की मृत्यु हुई है। उस पर सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी चिंता जाहिर की है। सेना के एक अधिकारी का कहना है कि सेना प्रमुख को इस मुद्दे पर तुरंत ध्यान देना चाहिए, इसका समाधान निकाला जाना चाहिए। एक वरिष्ठ सेना अधिकारी का कहना है कि अगर रात में जरूरत नहीं है तो ड्राइविंग नहीं करने का निर्देश दिया गया है। वहीं नौकरी के दबाव में जो अधिकारी आत्महत्या कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर में जिस तरह से देश की सेना लगातार आतंकियों के खिलाफ अपना अभियान चला रही है।
उससे बड़ी संख्या में आतंकियों को मौत को गले लगाना पड़ा है, लेकिन आत्महत्या और सड़क हादसे में मारे गए जवानों की संख्या कश्मीर में आतंक विरोधी कार्रवाई शहीद हुए जवानों की संख्या से दोगुनी है। हाल के आंकड़ों पर नजर डालें तो सड़क दुर्घटना में हर वर्ष 350 जवानों की जान चली जाती है। वहीं 120 जवान आत्महत्या कर लेते हैं। जबकि ट्रेनिंग के दौरान स्वास्ध्य वजहों की वजह से भी कई जवानों की जान चली जाती है। सेना में कुल 41000 अधिकारी हैं, जबकि 11.32 लाख सैनिक हैं, एयरफोर्स में 12000 अधिकारी हैं, 1.3 लाक एयरमैन हैं, जबकि नेवी में 9000 अधिकारी है, 52000 सेलर हैं। 1947-48 में जम्मू कश्मीर में ऑपरेशन में कुल 1104 सैनिक शहीद हुए थे। 1962 में चीन युद्ध के दौरान 3250 जवान शहीद हुए, 1965 पाकिस्तान के युद्ध में 3264 जवान शहीद हुए, 1971 में बांग्लादेश लिबरेशन युद्द में 3843 जवान शहीद हुए, 1987 श्रीलंका में ऑपरेशन में 1157 जवान शहीद हुए, 1999 में कारगिल युद्ध में 522 जवान शहीद हुए।


