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- एससी-एसटी ऐक्ट पर इलाहाबाद हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नाराज......
Posted by : achhiduniya
12 September 2018
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पहले आरोपी को नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाया जाए। यदि वह नोटिस की शर्तों का पालन करता है तो उसे विवेचना के दौरान गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। एससी-एसटी ऐक्ट पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले से आरोपियों की सीधे गिरफ्तारी पर नाराजगी जताई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना है कि इस ऐक्ट के अन्य कानून जिनमें सजा सात साल या कम है के तहत आरोपियों की सीधे गिरफ्तारी तभी संभव है जब यह आवश्यक हो। जस्टिस अजय लांबा व जस्टिस संजय हरकौली की बेंच ने ये बातें एससी-एसटी ऐक्ट में केंद्र सरकार के अध्यादेश के बाद 19 अगस्त को दर्ज एक प्राथमिकी रद करने की मांग वाली याचिका की सुनवाई के दौरान कही। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में गिरफ्तारी से पहले अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का पालन किया जाए। इसी के सथा कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी।
अनरेश कुमार केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि यदि किसी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में अपराध की अधिकतम सजा सात साल तक की है, तो ऐसे मामले में सीआरपीसी 41 व 41-ए के प्रावधानों का पालन किया जाएगा। विवेचक को पहले सुनिश्चित करना होगा कि गिरफ्तारी अपरिहार्य है, अन्यथा न्यायिक मैजिस्ट्रेट गिरफ्तार व्यक्ति की न्यायिक रिमांड नहीं लेगा। अनरेश कुमार बनाम बिहार सरकार केस में 2 जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था। बिना ठोस वजह के आरोपी की गिरफ्तारी केवल इसलिए कर ली जाए, क्योंकि यह विवेचक का अधिकार है, कोर्ट ने ऐसी प्रथा पर गंभीर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने सीआरपीसी-41 में संशोधन का हवाला देते हुए कहा था कि जिन मामलों में सजा सात साल या उससे कम है, उनमें गिरफ्तारी से पहले विवेचक बताना होगा गिरफ्तारी क्यों जरूरी है? कोर्ट ने कहा था कि अभियुक्त पूछताछ के लिए आता है और नोटिस की शर्तों का पालन करता है तो जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

