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- 25 साल पहले कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है....बीजेपी ने किया था विरोध....
25 साल पहले कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है....बीजेपी ने किया था विरोध....
Posted by : achhiduniya
26 November 2018
कई गैर सरकारी संगठनो और बीजेपी सहयोगी शिवसेना द्वारा सरकार पर राम मंदिर बनाने का दबाव बढ़ाने के चलते व जन मानस की भावनाओ को समझने से खिलवाड़ न करने की चेतावनी सरकार को दी जा रही है। एक तरफ सरकार पर अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का ज़ोर डालने की भी कोशिश की जा रही है। राम मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है। केंद्र की बीजेपी सरकार भले ही अभी इसके लिए विचार कर रही हो,लेकिन करीब 25 साल पहले ही कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है। यह जनवरी, 1993 में हुआ था। मतलब बाबरी मस्जिद गिराए जाने के केवल एक महीने बाद। उस वक्त पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे।
7 जनवरी, 1993 को राष्ट्रपति
शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी। बाद में एक तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने
इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था। पास होने के बाद इसे अयोध्या
अधिनियम कहा गया था। हालांकि उस वक्त बीजेपी ने इसका विरोध किया था। इंडिया टुडे
की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिल को पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने
कहा था, देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और
भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है। नरसिम्हा राव सरकार इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं बल्कि इसके चारों
ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत कर रही थी। इस पर
कांग्रेस सरकार राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और
अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी। बीजेपी ने उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा
राव का खुलकर विरोध किया था। तत्कालीन बीजेपी उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून
को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया
था।
बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी
इस कानून का विरोध किया था। नरसिम्हा राव सरकार ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से भी इस मसले पर सलाह
मांगी थी,लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर
दिया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की
विवादित जमीन पर पहले कोई हिंदू मंदिर या हिंदू ढांचा था? सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों (जस्टिस
एमएन वेंकटचलैया, जेएस वर्मा, जीएन रे, एएम अहमदी और एसपी भरूचा) की खंडपीठ ने इन सवालों
पर विचार तो किया लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट 1994 की व्याख्या की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से
तय किए फैसले में एक्ट के एक खंड को रद्द कर दिया था जिसमें इस मामले में चल रही
सारी सुनवाईयों को खत्म किए जाने की बात कही गई थी। हालांकि अयोध्या एक्ट रद्द
नहीं किया गया था। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद और लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं के इंतजाम
की बात का समर्थन किया था,लेकिन इस आदेश को राष्ट्रपति के लिए
बाध्यकारी नहीं बताया था, जिसके चलते अयोध्या एक्ट लटक गया और व्यर्थ
हो गया। [साभार]


