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- 6 अप्रैल शनिवार चेट्रीचंद्र - चैत्र नवरात्रि - गुड़ी पड़वा का बन रहा अदभुद संजोग....
Posted by : achhiduniya
05 April 2019
चैत्र नवरात्रि साल में आने वाले सबसे पहले नवरात्र होते हैं।
इस नवरात्र से ही हिंदू नववर्ष का आरंभ माना जाता है। इसके साथ रामायण के अनुसार
माना जाता है कि भगवान राम ने चैत्र के महीने में देवी दुर्गा की उपासना कर रावण
का वध कर विजय प्राप्त की थी। गुड़ी पड़वा को हिन्दू नववर्ष की शुरुआत माना जाता
है, यही कारण है कि हिन्दू धर्म के सभी लोग इसे
अलग-अलग तरह से पर्व के रूप में मनाते हैं। सामान्य तौर पर इस दिन हिन्दू परिवारों
में गुड़ी का पूजन कर इसे घर के द्वार पर लगाया जाता है और घर के दरवाजों पर आम के
पत्तों से बना बंदनवार सजाया जाता है। गुड़ी पड़वा का पर्व चैत्र मास की शुक्ल
प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसे वर्ष प्रतिपदा या उगादि भी कहा जाता है।
गुड़ी पड़वा शब्द
में गुड़ी का अर्थ होता है विजय पताका और पड़वा प्रतिपदा को कहा जाता है। गुड़ी
पड़वा को लेकर यह मान्यता है, कि इस दिन
भगवान राम ने दक्षिण के लोगों को बाली के अत्याचार और शासन से मुक्त किया था, जिसकी खुशी के रूप में हर घर में गुड़ी अर्थात
विजय पताका फहराई गई। आज भी यह परंपरा महाराष्ट्र और कुछ अन्य स्थानों पर प्रचलित
है, जहां हर घर में गुड़ी पड़वा के
दिन गुड़ी फहराई जाती है। ऐसा माना जाता है कि गुड़ी पड़वा यानि
वर्ष प्रतिपदा के दिन ही ब्रम्हा जी ने संसार का निर्माण किया था। इसलिए इस दिन को
नव संवत्सर यानि नए साल के रूप में मनाया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि यह बंदनवार
घर में सुख, समृद्धि और खुशियां लाता है। गुड़ी पड़वा के
दिन खास तौर से हिन्दू परिवारों में पूरनपोली नामक मीठा व्यंजन बनाने की परंपरा है, जिसे घी और शक्कर के साथ खाया जाता है। वहीं
मराठी परिवारों में इस दिन खास तौर से श्रीखंड बनाया जाता है, और अन्य व्यंजनों व पूरी के साथ परोसा जाता है।
आंध्रप्रदेश में इस दिन प्रत्येक घर में पच्चड़ी प्रसाद बनाकर वितरित किया जाता
है। गुड़ी पड़वा के दिन नीम की पत्तियां खाने का भी विधान है। इस दिन सुबह जल्दी
उठकर नीम की कोपलें खाकर गुड़ खाया जाता है। इसे कड़वाहट को मिठास में बदलने का
प्रतीक माना जाता है। हिन्दू पंचांग का आरंभ भी गुड़ी पाढ़वा से ही होता है। कहा
जाता है के महान गणितज्ञ- भास्कराचार्य द्वारा इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त
तक दिन, मास और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की
गई थी।
6 अप्रैल से चैत्र नवरात्रि शुरू हो रहे हैं, जो 14 अप्रैल तक चलेंगे। पूरे साल में चार बार नवरात्र आते हैं। चैत्र नवरात्रि से ज्यादा महत्व शारदीय
नवरात्रि का होता है, जो सितंबर से अक्टूबर के दौरान आते हैं।
हिंदू मान्यता के अनुसार चैत्र और शारदीय नवरात्र को ही महत्वपूर्ण माना गया है। चैत्र
नवरात्रि को वासंतिक नवरात्र भी कहा जाता
है। 6 अप्रैल से नौ दिनों तक पूरे विधि-विधान से
दुर्गा मां के नौ रूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और
मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाएगी। चैत्र नवरात्रि के आखिरी दिन 14 अप्रैल को राम नवमी मनाई जाएगी। चैत्र नवरात्रि हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश
और उत्तराखंड में बहुत लोकप्रिय है। महाराष्ट्र राज्य में इस दिन से गुड़ी पड़वा शुरू हो जाती है, जबकि आंध्र
प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में, इस दिन से उगादी उत्सव से शुरू होता है।
सिंधी समाज के इष्ट देव श्री झूलेलाल जी के अवतार दिवस के रूप में चेट्रीचंद्र का उत्सव मनाया जाता है.जो संयोग से इसी दिन आ रहा है.




