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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले से जुड़ी सभी 18 पुनर्विचार याचिकाओ को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया....
Posted by : achhiduniya
12 December 2019
सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या जमीन विवाद मामले में
नौ नवंबर को अपना फैसला सुनाया था। अदालत ने विवादित जमीन रामलला को यानी राम
मंदिर बनाने के लिए देने का फैसला किया था। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के
पांच जजों की विशेष पीठ के 9 नवम्बर के फैसले पर पुनर्विचार के लिए कुल 18
याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इनमें 9 याचिकाएं पक्षकारों की ओर से और बाकी नौ अन्य
याचिकाकर्ताओं की थीं। चूंकि ये रिप्रेजेंटेटिव सूट यानी प्रतिनिधियों के जरिए लड़ा
जाने वाला मुकदमा था, लिहाजा सिविल यानी दीवानी मामलों
की संहिता सीपीसी के तहत पक्षकारों के अलावा भी कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल कर
सकता था। इनमें से एक याचिका अखिल भारत हिंदू महासभा की थी,जबकि
दूसरी याचिका 40 से अधिक लोगों ने संयुक्त रूप से दायर की।
संयुक्त याचिका दायर
करने वालों में इतिहासकार इरफान हबीब,अर्थशास्त्री व
राजनीतिक विश्लेषक प्रभात पटनायक,मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष
मंदर,नंदिनी सुंदर और जॉन दयाल शामिल हैं। हिंदू महासभा ने
अदालत में पुनर्विचार याचिका दायर करके मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ भूमि उत्तर
प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को आवंटित करने के निर्देश पर सवाल उठाये हैं। महासभा ने
फैसले से इस अंश को हटाने का अनुरोध किया है,जिसमें विवादित
ढांचे को मस्जिद घोषित किया गया है। इस मामले में सबसे पहले 2 दिसंबर को पहली
पुनर्विचार याचिका मूल वादी एम सिदि्दकी के कानूनी वारिस मौलाना सैयद अशहद रशीदी
ने दायर की थी। इसके बाद,छह दिसंबर को मौलाना मुफ्ती हसबुल्ला,मोहम्मद उमर,मौलाना महफूजुर रहमान,हाजी महबूब और मिसबाहुद्दीन ने
दायर कीं। इन सभी पुनर्विचार याचिकाओं को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का
समर्थन प्राप्त है। इसके बाद 9 दिसंबर को दो पुनर्विचार याचिकायें और दायर की गई
थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या स्थित रामन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दायर की
गई 18 पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। गुरुवार को जिन पांच जजों की बेंच
ने सुनवाई की उसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एस ए बोबडे
की अध्यक्षता वाली में जस्टिस धनन्जय वाई चंद्रचूड़,जस्टिस
अशोक भूषण,जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना
शामिल हैं। पहले इस बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई भी थे,लेकिन
उनके रिटायर्मेंट के बाद उनकी जगह जस्टिस संजीव खन्ना को शामिल किया गया था।


