- Back to Home »
- Judiciaries »
- कानूनी प्रावधान क्यूरेटिव पिटीशन से क्या बच सकते है रेप-हत्या की सजा पाए फांसी के अपराधी....?
Posted by : achhiduniya
09 January 2020
बीते 7 जनवरी को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट
ने निर्भया के साथ वर्ष 2012 में चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म और उसकी मौत के
गुनहगारों के खिलाफ 'डेथ वारंट' जारी
किया। पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा ने डेथ
वारंट जारी करते हुए दोषियों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में
फांसी देने का निर्देश दिया। इस पर दोषी के वकील ने अदालत में निर्भया गैंगरेप केस
में सुप्रीम कोर्ट में पहली क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर दी गई है। दोषी विनय शर्मा
की तरफ से यह क्यूरेटिव याचिका दाखिल की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में किसी भी दोषी की
फांसी की सजा पर मुहर लगने के बाद उसके पास फांसी से बचने के लिए दो विकल्प होते
हैं। इनमें पहला विकल्प होता है दया याचिका, जो राष्ट्रपति
के पास भेजी जाती है। पुनर्विचार याचिका जो सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है अगर ये
दोनों याचिकाएं खारिज हो जाती हैं तो दोषी के पास क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने का
ऑप्शन होता है। यह पिटीशन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर की जाती है। इसमें कोर्ट ने
जो सज़ा तय की है,उसमें कमी के लिए आग्रह किया जाता है यानि
की फांसी की सज़ा उम्रकैद में बदल सकती है। यह विकल्प इसलिए है,ताकि न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो सके। सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव
पिटीशन फाइल करते हुए याचीकाकर्ता को यह
बताना होता है कि वह किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है।
इस
याचिका का किसी वरिष्ठ वकील द्वारा द्वारा सत्यापित होना जरूरी होता है। इस
पिटीशन को सबसे पहले कोर्ट के 3 सबसे वरिष्ठ जजों के पास
भेजा है। उनका फैसला अंतिम होता है। क्यूरेटिव पिटीशन पर फैसला आने के बाद अपील के
सारे रास्ते खत्म हो जाते हैं। क्यूरेटिव याचिका पर फैसला प्रतिकूल आने के बाद भी
दोषियों के पास संवैधानिक अधिकार के तहत राष्ट्रपति के पास जीवनदान के लिए दया याचिका
दाखिल करने का मौका रहता है। राष्ट्रपति तक दया याचिका पहुंचाने और राष्ट्रपति के
फैसले की सूचना जेल तक पहुंचने की भी प्रक्रिया है। 2014 के शत्रुघ्न चौहान फैसले में सुप्रीम कोर्ट
ने कहा था कि दया याचिका सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि दोषी का संवैधानिक अधिकार
है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर दिशा निर्देश भी जारी किए थे।


