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- कौन हैं छठी मइया क्या है छठ पूजा में अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व..?
Posted by : achhiduniya
17 November 2020
हिंदू धर्म में छठ पूजा/ छठ व्रत का काफी महत्व
है। 18 नवंबर से
शुरू होने वाले इस व्रत की मान्यता है कि जो भक्त पूरी श्रद्धा और सावधानी के साथ छठ का व्रत पूरा कर
लेता है सूर्य देव उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। छठ में सूर्य भगवान की पूजा
की जाती है और भोग लगाया जाता है। इसके बाद लोग निर्जला उपवास से व्रत की शुरुआत
करते हैं। यह व्रत काफी कठिन होता है। साथ ही इस व्रत में कई चीजों में सावधानी और
शुद्धता का बहुत ख्याल रखा जाता है नहीं तो व्रत खंडित हो जाता है। छठ पूजा में
पूजा की सामग्री और सूर्य देव को अर्पित किए जाने वाले भोग का काफी महत्व है। इसके
बिना छठ पूजा अधूरी है। कार्तिक मास की षष्टी को छठ मनाई जाती है। छठे दिन पूजी
जाने वाली षष्ठी मइया को बिहार में आसान भाषा में छठी मइया कहकर पुकारते हैं।
मान्यता है कि छठ पूजा के दौरान पूजी जाने वाली यह माता सूर्य भगवान की बहन हैं।
इसीलिए लोग सूर्य को अर्घ्य देकर छठ मैया को प्रसन्न करते हैं। वहीं, पुराणों में मां दुर्गा के छठे रूप कात्यायनी देवी को भी छठ
माता का ही रूप माना जाता है। छठ मइया को संतान देने वाली माता के नाम से भी जाना
जाता है। मान्यता है कि जिन छठ पर्व संतान के लिए मनाया जाता है। खासकर वो जोड़े
जिन्हें संतान का प्राप्ति नही हुई। वो छठ का व्रत रखते हैं, बाकि सभी अपने बच्चों की सुख-शांति के लिए छठ मनाते हैं। छठ
पूजा में अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व:- यह बात सभी को मालूम है कि सूरज की
किरणों से शरीर को विटामिन डी मिलती है और उगते सूर्य की किरणों के फायदेमंद और
कुछ भी नहीं। इसीलिए सदियों से सूर्य नमस्कार को बहुत लाभकारी बताया गया। वहीं, प्रिज्म के सिद्धांत के मुताबिक सुबह की सूरत की रोशनी से मिलने
वाले विटामिन डी से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है और स्किन से जुड़ी सभी
परेशानियां खत्म हो जाती हैं। बिहार में यह महापर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
छठी मइया को पूरे विधि-विधान से पूजा जाता है। छठ पर्व के पहले दिन नहाय-खाए, दूसरे दिन खरना या लोहंडा मनाया जाता है। वहीं, षष्ठी की शाम ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर अगली
सुबह उगते सूरज को अर्घ्य देने के साथ छठ पर्व का समापन किया जाता है। मान्यता है
कि छठ का




