Posted by : achhiduniya 17 April 2021

मुस्लिम समुदाय के लोग साल भर रमज़ान के महीने का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यताएं हैं कि रमज़ान के महीने में की गई इबादत का सवाब आम दिनों में की गई इबादतों के मुकाबले 70 गुनाह ज्यादा मिलता है।  इस्लाम में रमज़ान के पाक महीने में रोज़ा रखने और नमाज़ पढ़ने के साथ कुरान पढ़ने की भी काफी फजीलत बताई गई है, क्योंकि रमज़ान के महीने में ही 21वें रोजे को 

पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब पर अल्लाह ने कुरान शरीफ' नाजिल किया था यानी कुरान अस्तित्व में आया था। इसलिए इस महीने में कुरान पाक की ज्यादा से ज्यादा तिलावत की जाती है। मुस्लिम समुदाय के लोग रमज़ान के पूरे महीने लगभग 29 या 30 दिन तक रोजे रखते हैं नमाज़ पढ़ते हैं और कुरान की तिलावत करते हैं। इस बार रमजान का पाक महीना 14 अप्रैल 2021 से शुरू हो चुका है यानी 13 अप्रैल की देर रात सुबह सूरज निकलने से पहले रमज़ान के महीने की पहली सहरी खाई गई और इसके 

बाद आज 14 अप्रैल से ही रोजे़- नमाज़ का सिलसिला शुरू हो गया। मान्यताएं हैं कि इस महीने में अल्लाह अपने बंदों को बेशुमार रहमतों से नवाज़ता है और उनपर दोज़ख (जहान्नम) के दरवाजे बंद कर के जन्नत (स्वर्ग) के दरवाजे खोल देता है। माना जाता है कि रमज़ान के महीने में अल्लाह अपने बंदों की हर जायज़ दुआ को कुबूल करता है और उनको गुनाहों से बख्शीश (बरी) करता है।  यही वजह है कि इस महीने में लोग इबादत करने के साथ-साथ अल्लाह से अपने गुनाहों की दिल से तौबा भी 

करते हैं। रमज़ान के महीने में हर दिन 5 वक्त की नमाज़ के अलावा रात के वक्त एक विशेष तरह की नमाज़ भी पढ़ी जाती है, जिसे तरावीह कहते हैं। रमज़ान के महीने का चांद दिखने के बाद से ही तरावीह (एक तरह की नमाज़) पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रमज़ान के महीने में सहरी और इफ्तार करने की भी बेहद फजीलत है। सहरी सुबह सूरज निकलने से पहले खाए गए खाने को कहते हैं। सहरी खाकर ही रोजा रखा जाता है। कहा जाता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने सहरी करने को सुन्नत 


बताया है।  कहते हैं कि सहरी करने से बरकत होती है। इसलिए सहरी करने से सवाब मिलता है। शाम में सूरज ढलने पर जब रोजा खोलते हैं तो उसे इफ्तार कहते हैं। कहा जाता है कि इफ्तार के समय रोजेदार दिल से जो दुआ मागंते हैं, अल्लाह उनकी तमाम जायज दुआएं कुबूल करता है। रोजे रखने का मतलब सिर्फ खाने और पीने की चीजों से दूरी बनाना नहीं होता है। बल्कि रोजा आंख, जुबान और कान का भी होता है यानी रोजा रखने के बाद रोजेदार ना गलत बात कर सकता है और ना झूठ बोल सकता है और ना ही किसी की बुराई कर सकता है। इसी तरह गलत चीजों को देखने और सुनने से भी रोजा टूट जाता है। 

इसलिए कहा जाता है कि रोजा रखने पर इंसान हर गलत काम और बुराइयों से पाक हो जाता है। इसलिए रमज़ान इस्लाम धर्म के सबसे पाक और अहम महीनों में से एक है।

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