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- पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी हिंदू-मुस्लिम पर भारतीय संविधान क्या कहता है कानून?
Posted by : achhiduniya
17 September 2023
भारत में
विवाह का मामला पर्सनल लॉ से जुड़ा हुआ है। पर्सनल लॉ ऐसा कानून है जो लोगों के
व्यक्तिगत मामलों में लागू होता है। इस कानून के अंतर्गत धर्म या समुदाय आते हैं। कानून
के तहत एक पति या पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह करना भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 494 के अंतर्गत दंडनीय अपराध माना
जाता है। इस धारा के अंतर्गत दूसरा विवाह
करने पर 7 साल की जेल की सजा हो सकती है। भारत में विवाह दो प्रकार से
होते हैं। एक विवाह पर्सनल लॉ के अंतर्गत होता है और दूसरा विवाह विशेष विवाह
अधिनियम के तहत, 1956 के अंतर्गत। दोनों ही कानूनों में पति
या पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरे विवाह को दंडनीय अपराध माना
जाता है। जैसे कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 17 दूसरा विवाह करने पर सजा का उल्लेख
करती है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये अधिनियम धर्म और प्रथाओं को ध्यान में
रखते हुए लागू होता है। जैसे हिंदू समाज में दूसरा विवाह मान्य नहीं है तो इस
कानून के तहत ऐसी शादी करने वाले व्यक्ति को सजा का प्रावधान है, लेकिन वहीं मुसलिम समाज में दूसरा विवाह गलत नहीं माना जाता। ऐसे
में इस कानून के तहत वहां सजा का प्रावधान नहीं है।
भले ही इस अपराध के तहत सजा का
प्रावधान है, लेकिन इसे असंज्ञेय अपराध माना जाता है।
जिसके तहत पुलिस संबंधित व्यक्ति की शिकायत दर्ज कर व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर
सकती। इस अपराध को शिकायकर्ता परिवाद के तौर पर प्रस्तुत कर सकता है,अगर पति या
पत्नी दूसरी शादी कर लेते हैं तो ऐसे मामले में पति या पत्नी ही शिकायत कर सकते
हैं। उनके परिवार का कोई अन्य सदस्य इस तरह की शिकायत करने का हकदार नहीं होता। भारत
के संविधान के तहत दूसरे विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं होती। हालांकि
संविधान ने ऐसे मामलों में पत्नी के प्रति उदारता बरतते हुए दूसरी पत्नी को भी
भरण-पोषण का अधिकारी माना है।
कानून के तहत ऐसे मामलों में दूसरी पत्नी और उसके
बच्चे भी भरण-पोषण का अधिकार रखते हैं और अपने पिता की संपत्ति में भी अधिकार रखते
हैं। वहीं किसी पति या पत्नी को अपने साथी की दूसरे विवाह की शिकायत करनी हो तो
ऐसे मामलों में कोई निश्चित अवधि नहीं होती। 10 साल बाद भी
वह व्यक्ति अपने साथी की दूसरे विवाह की शिकायत कर सकता है। ऐसे मामलों में आरोपी
पाए जाने पर न्यायलय द्वारा उसे सजा दी जाती है। हालांकि अदालत मौजूदा सबूतों और
गवाहों के आधार पर मामले में फैसला सुनाती है।
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