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- कांवड़ यात्रा मार्ग V/S बैनरों पर क्यूआर कोड सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद...
Posted by : achhiduniya
15 July 2025
श्रावण मास में शिवलिंगों का
जलाभिषेक करने के लिए बड़ी संख्या में भक्त गंगा से पवित्र जल लेकर विभिन्न
स्थानों से कांवड़ लेकर आते हैं। कई श्रद्धालु इस महीने में मांसाहार का त्याग
करते हैं। कई लोग तो प्याज और लहसुन युक्त भोजन भी नहीं खाते। बीते 25 जून को उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा जारी एक प्रेस
विज्ञप्ति का हवाला देते हुए झा ने कहा, नए उपायों में कांवड़ मार्ग पर
स्थित सभी भोजनालयों पर क्यूआर कोड प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है। इससे
मालिकों के नाम और पहचान का पता चलता है, जिससे वही भेदभावपूर्ण प्रोफाइलिंग
प्राप्त होती है जिस पर पहले इस न्यायालय ने रोक लगा दी थी। याचिका में कहा गया है
कि उत्तर प्रदेश सरकार का निर्देश,जिसमें स्टॉल मालिकों से कानूनी
लाइसेंस आवश्यकताओं के तहत धार्मिक और जातिगत पहचान का खुलासा करने को कहा गया है
ये निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसके तहत दुकान, ढाबा और रेस्तरां व अन्य शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर
प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों से उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें कांवड़ यात्रा
मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं को अपने बैनरों पर क्यूआर कोड स्टिकर लगाने के सरकारी
आदेश को चुनौती दी गई है। इससे तीर्थयात्रियों को विक्रेताओं की जानकारी मिल सकेगी।
यह मामला न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ के
समक्ष सुनवाई के लिए आया।
पीठ ने राज्य सरकारों को इस मामले में अपना जवाब दाखिल
करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई अगले मंगलवार को
निर्धारित की है। शिक्षाविद अपूर्वानंद झा और अन्य ने एक नया आवेदन दायर किया है। सुनवाई
के दौरान उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के वकील जतिंदर कुमार सेठी ने याचिका पर जवाब
दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय मांगा। हालांकि एक आवेदक की ओर से वरिष्ठ
अधिवक्ता शादान फरासत ने तर्क दिया कि यह मामला समय के लिहाज से संवेदनशील है
क्योंकि कांवड़ यात्रा दस-बारह दिनों में समाप्त हो जाएगी। इस मामले में अन्य
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह और हुजेफा अहमदी ने
प्रतिनिधित्व किया।