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- कुल का चिराग कौन...? बेटी या बेटा विज्ञान ने दूर किया भ्रम-सरनेम बनाम साइंस: असली सच्चाई क्या...?
Posted by : achhiduniya
31 December 2025
गहराई से सोचें, तो वंश का मतलब सिर्फ
नाम या गोत्र नहीं होता। समाज में आज भी यह माना जाता है कि पिता का सरनेम ही वंश
का प्रतीक है,लेकिन जेनेटिक साइंस में
सरनेम जैसी कोई चीज नहीं होती।आज के मॉडर्न और
वैज्ञानिक दौर में यह जरूरी हो गया है कि हम पुरानी सोच को विज्ञान की रोशनी में
परखें। यह मानना कि वंश सिर्फ बेटों से चलता है, न केवल बेटियों के साथ
अन्याय है, बल्कि यह साइंस के भी खिलाफ है। DNA
यह
नहीं देखता कि बच्चा किस नाम से पहचाना जाएगा वह सिर्फ यह तय करता है कि कौन-से
गुण आगे जाएंगे। बेटियां अपने बच्चों को
भी पूरा DNA देती हैं। इस DNA में उनके पिता (यानी
नाना) के गुण भी शामिल होते हैं। इस तरह,
पिता
की जेनेटिक पहचान अगली पीढ़ी तक बेटियों के जरिए भी पूरी मजबूती से पहुंचती है
यानी अगर वंश को DNA के आधार पर देखें,
तो
बेटियां भी उतनी ही जिम्मेदार हैं जितने बेटे। गुणों से चलता है वंश, सिर्फ नाम से नहीं:-संस्कारों से,व्यवहार से,सोच और मूल्यों से और DNA
से सभी चीजें बेटियां और
बेटे-दोनों आगे बढ़ाते हैं। कई बार बेटियां परिवार की सोच, संस्कार और संस्कृति को
ज्यादा बेहतर तरीके से आगे ले जाती हैं। ऐसे में उन्हें वंश से अलग मानना न सिर्फ गलत,
बल्कि
अवैज्ञानिक भी है। सच्चाई यह है कि वंश किसी एक लिंग से नहीं चलता। बेटियां और
बेटे-दोनों अपने-अपने तरीके से वंश को आगे बढ़ाते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार,
हर
बेटी अपने पिता से 50 प्रतिशत DNA
लेती
है। यह DNA सिर्फ शारीरिक बनावट तक सीमित नहीं होता,
बल्कि
इसमें कई मानसिक, भावनात्मक और व्यवहारिक
गुण भी शामिल होते हैं। साइंस साफ कहता है कि DNA,
गुण
और विरासत में बेटियों की भूमिका भी उतनी ही मजबूत है। इसी वजह से कहा जाता है कि
बेटियां पिता की कॉपी होती हैं। यह सिर्फ भावनात्मक बात नहीं,
बल्कि
इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक आधार है। जेनेटिक्स बताती है कि पिता के कई जीन बेटियों के
व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि पिता-बेटी का रिश्ता
इतना खास और गहरा माना जाता है। अब समय आ गया है कि हम कुल का चिराग जैसी सोच से
आगे बढ़ें और बेटियों को भी वंश की बराबर की वाहक के रूप में स्वीकार करें।
यही
सोच एक प्रगतिशील और वैज्ञानिक समाज की पहचान है। दिलचस्प बात यह है कि mtDNA
केवल
मां से ही मिलता है, पिता से नहीं यानी अगर
एनर्जी, स्टैमिना और सेल हेल्थ की बात करें,
तो
वंश को आगे बढ़ाने में मां की भूमिका निर्णायक होती है। इस नजरिए से देखें तो
बेटियां भी वंश को आगे बढ़ाने में उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं,
जितनी
बेटे। कई वैज्ञानिक अध्ययनों और जेनेटिक रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि पिता और
मां-दोनों की जेनेटिक विरासत अगली पीढ़ी तक बेटियों और बेटों,
दोनों
के जरिए समान रूप से पहुंचती है। आज जरूरत है इस सोच को समझने की,
ताकि
समाज बेटियों को कमतर नहीं, बल्कि वंश की बराबर की
वाहक माने। आधुनिक विज्ञान साफ-साफ कहता है कि वंश सिर्फ नाम या सरनेम से नहीं,
बल्कि
DNA और गुणों से आगे बढ़ता है।
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