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- तेल कुओं को स्थायी नुकसान,इकॉनॉमिक फ्यूरी …
Posted by : achhiduniya
28 April 2026
ईरान को दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। पहला मोर्चा रोजमर्रा की जरूरत
की चीजों और खाद्य संकट को रोकना है, जबकि
दूसरा और सबसे गंभीर मोर्चा युद्ध स्तर पर अपने तेल कुओं को बचाने का है,अगर ईरान
तेल प्रोडक्शन बंद करता है, तो
उसकी तेल क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाई
गई नौसैनिक नाकाबंदी अब तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुकी है। इस नाकाबंदी का नाम अमेरिका ने इकॉनॉमिक फ्यूरी
-आर्थिक
तूफान रखा है, जिसका मकसद ईरान के तेल उद्योग
को पूरी तरह से बर्बाद करना है। जानकारों
के मुताबिक होर्मुज स्ट्रेट खुलने की संभावनाएं फिलहाल बेहद कम हैं और इस तनाव से
पूरे मिडिल ईस्ट में बड़े युद्ध का खतरा कई गुना बढ़ गया है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस
महासंग्राम (बड़े
युद्ध) का केंद्र ओमान की
खाड़ी बन सकता है, जहां
अमेरिकी युद्धपोत पहले से ही तैनात हैं। रिपोर्ट्स
के मुताबिक, ईरान फिलहाल करीब 20
लाख
बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन कर रहा है, लेकिन
उसकी कुल भंडारण क्षमता मात्र 12 करोड़
बैरल ही है। 29 अप्रैल
तक यह क्षमता पूरी तरह भरने की उम्मीद है। ईरान ने अपने सभी बड़े टैंकरों में भी
तेल भरना शुरू कर दिया है, लेकिन
वे भी लगभग भर चुके हैं। फारस की खाड़ी में तेल से भरे टैंकर तैर रहे हैं। अमेरिकी
वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक पोस्ट में कहा है, बचे
हुए IRGC नेता सीवेज पाइप में
फंसे चूहों की तरह दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी नाकाबंदी से
ईरान का तेल उद्योग उत्पादन बंद करने की कगार पर है और वहां जल्द ही पेट्रोल की
कमी होने वाली है।
ईरान
का ज्यादातर तेल सोर क्रूड है।
पाइपलाइन में तेल रुकने से यह पानी और गैसों के साथ मिलकर एक एसिड बनाता है,
जिससे
पाइपलाइन और पंपिंग स्टेशन के पुर्जों में तेजी से जंग लगने और उनके गलने का खतरा
बढ़ जाता है। भविष्य में पंप दोबारा शुरू करने पर उनके डैमेज होने का खतरा कई गुना
ज्यादा होगा। ईरान के पुराने तेल कुओं में तेल के नीचे पानी की परत होती है।
पंपिंग रुकने से नीचे का पानी ऊपर आकर चट्टानों में घुस सकता है,
जिससे
तेल चट्टानों में हमेशा के लिए फंस जाएगा।
साथ ही, दबाव कम होने से चट्टानें आपस
में चिपक या ढह सकती हैं, जिससे
भविष्य में तेल निकालना मुश्किल हो जाएगा। अनुमान है कि ऐसा होने पर ईरान अपनी आने
वाली उत्पादन क्षमता का 20 से
30 फीसदी हमेशा के लिए खो देगा।


