- Back to Home »
- Religion / Social »
- कहां ली अंतिम श्वास कैंची धाम के नीम करोली बाबा उर्फ लक्ष्मी नारायण शर्मा ने....?
Posted by : achhiduniya
11 September 2026
नीम
करोली बाबा का संदेश बहुत सरल था। वह प्रेम को सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। वह लोगों
से कहते थे कि भगवान का नाम लो और दूसरों की सेवा करो। वे कहते थे सभी लोगों से
प्रेम करें। जरूरतमंद की सहायता करें।
भोजन का सम्मान करें। अहंकार से दूर रहें। हनुमान जी की भक्ति करें। कठिन समय में धैर्य रखें। सेवा को जीवन का
हिस्सा बनाएं। लक्ष्मी नारायण शर्मा से नीम करोली बाबा बनने की यात्रा केवल एक
व्यक्ति के संत बनने की कहानी नहीं है। यह गृहस्थ जीवन, वैराग्य, सेवा और भक्ति के बीच संतुलन की कहानी
भी है। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं आस्था पर आधारित हैं। लक्ष्मी नारायण शर्मा का मन बचपन से ही
धार्मिक कार्यों में लगता था। वे पूजा-पाठ करते,हनुमान जी के प्रति उनकी गहरी
आस्था थी। किशोरावस्था में ही उन्हें संसार की मोह माया से दूरी महसूस होने लगी थी।
करीब 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह राम बेटी
देवी से कर दिया गया। विवाह के बाद भी उनका मन पूरी तरह गृहस्थ जीवन में नहीं लगा।
वह साधु जीवन और आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित होते रहे। प्रचलित कथाओं के
अनुसार, करीब 17 वर्ष की आयु में
उन्हें आध्यात्मिक
अनुभव हुआ। इसके बाद उनका झुकाव साधना की ओर और बढ़ गया। वह घर छोड़कर अलग-अलग
स्थानों पर घूमने लगे। इस दौरान उन्होंने कई जगहों पर तपस्या की। गुजरात के
बवानिया मोरबी क्षेत्र में भी उन्होंने साधना की,वहां लोग उन्हें तलइया बाबा के
नाम से जानने लगे। आगे चलकर उन्हें लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा और तिकोनिया वाले बाबा
जैसे नामों से भी पुकारा गया। उनका जीवन किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहा। वह
गांवों, कस्बों और धार्मिक स्थानों पर जाते थे।
लोगों की समस्याएं सुनते थे। जरूरतमंदों की सहायता करते। उनके लिए सेवा ही साधना
का एक महत्वपूर्ण रूप थी। कई वर्षों तक घर से दूर रहने के बाद पिता को पता चला कि
फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव में उनके जैसे दिखने वाला एक साधु रह रहा है।
उनके पिता वहां पहुंचे। उन्होंने लक्ष्मी नारायण शर्मा को पहचान लिया। पिता के
आग्रह पर उन्हें घर वापस लौटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कुछ समय गृहस्थ जीवन
बिताया। उनके दो पुत्र और एक पुत्री हुए।
हालांकि, उनका मन हमेशा आध्यात्मिक कार्यों में
लगा रहा। परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ वह लोगों की सहायता भी करते
थे। स्थानीय लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती गई। कई कथाओं में उन्हें लंबे समय
तक गांव का निर्विरोध प्रधान भी बताया गया है। नीम करोली बाबा के नाम से जुड़ी
सबसे प्रसिद्ध कथा ट्रेन की है,कहा जाता है कि एक बार वह ट्रेन से यात्रा कर रहे
थे। उनके पास टिकट नहीं था। टिकट जांचने वाले कर्मचारी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के
फर्रुखाबाद क्षेत्र में स्थित नीब करौरी स्टेशन के पास ट्रेन से उतार दिया। बाबा
ट्रेन से उतरकर एक स्थान पर बैठ गए। इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। रेलवे कर्मचारियों
ने ट्रेन को चलाने की कोशिश की, लेकिन
सफलता नहीं मिली। स्थानीय लोगों ने इसे बाबा की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़कर देखा। कहा जाता है कि अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा
से दोबारा ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया। बाबा के ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन
चल पड़ी। इसी घटना के बाद लोग उन्हें नीम करौरी बाबा कहने लगे। समय के साथ यही
नाम बदलकर नीम करोली बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गया। कैंची धाम धीरे-धीरे बाबा
के प्रमुख आश्रम के रूप में प्रसिद्ध हो गया। बाबा यहां आने वाले लोगों से मिलते
थे। वह उनकी बातें सुनते थे। लोगों को प्रेम, ईमानदारी और सेवा का संदेश देते थे।
बाबा का मानना था कि भगवान की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भूखे को
भोजन देना, दुखी की सहायता करना और जरूरतमंद की
मदद करना भी भक्ति का हिस्सा है। कैंची धाम में हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस
अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त हनुमान जी की पूजा करते हैं।
प्रसाद बांटा जाता है। पूरे परिसर में भक्ति और सेवा का वातावरण दिखाई देता है। नीम
करोली बाबा ने अपने जीवन का अंतिम समय वृंदावन में बिताया। बताया जाता है कि 11 सितंबर 1973 को उन्होंने शरीर त्याग दिया। उनके
निधन के बाद भी उनकी शिक्षाएं और स्मृतियां लोगों के बीच जीवित रहीं। कैंची धाम आज
भी उनके भक्तों के लिए प्रमुख तीर्थस्थल है। भारत और विदेशों में उनके नाम से कई
आश्रम और सेवा केंद्र चलाए जाते हैं।


