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- चरणामृत से कैसे बनी गंगा…… क्या महत्व है चरणामृत का.......?
Posted by : achhiduniya
13 October 2015
हिन्दू
धर्म के अनुसार जब भी
कोई भक्त मंदिर जाता
है,
तो पंडित
जी उन्हे
भगवान का
चरणामृत
देते है।क्या...?कभी आपने यह
जानने
की कोशिश
की चरणामृत
का क्या
महत्व
है।शास्त्रों
में कहा गया
है:-अकालमृत्युहरणं
सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो:
पादोदकं
पीत्वा
पुनर्जन्म
न विद्यते।अर्थात
भगवान
विष्णु
के चरण
का अमृत
रूपी जल
समस्त
पाप- व्याधियोंका
शमन करने
वाला है
तथा औषधी
के समान
है।जो
चरणामृत पीता
है उसका
पुनः जन्म
नहीं होता"जल
तब तक
जल ही
रहता है
जब तक
भगवान
के चरणों
से नहीं
लगता,जैसे
ही भगवान
के चरणों
से लगा
तो अमृत
रूप हो
गया और
चरणामृत
बन जाता
है।
जब
भगवान
का वामन
अवतार
हुआ और
वे राजा
बलि की
यज्ञ शाला
में दान
लेने गए
तब उन्होंने
तीन पग
में तीन
लोक नाप
लिए जब
उन्होंने
पहले पग
में नीचे
के लोक
नाप लिए
और दूसरे
में ऊपर
के लोक
नापने
लगे तो
जैसे ही
ब्रह्म
लोक में
उनका चरण
गया तो
ब्रह्मा
जी ने
अपने कमंडलु
में से
जल लेकर भगवान
के चरण
धोए और
फिर चरणामृत
को वापस
अपने कमंडल
में रख
लिया।वह
चरणामृत
गंगा जी
बन गई, जो
आज भी
सारी दुनिया
के पापों
को धोती
है, ये
शक्ति
उनके पास
कहाँ से
आई ये
शक्ति
है भगवान
के चरणों
की।
जिस
भगवान पर ब्रह्मा
जी ने
साधारण
जल चढाया
था,किन्तु चरणों
का स्पर्श
होते ही
गंगा जी
बन गई।धर्म
में इसे
बहुत ही
पवित्र
माना जाता
है तथा
मस्तक
से लगाने
के बाद
इसका सेवन
किया जाता
है।भगवान
श्री राम के
चरण धोकर
उसे चरणामृत
के रूप
में स्वीकार
कर केवट
न केवल
स्वयं
भव-बाधा
से पार
हो गया
बल्कि
उसने अपने
पूर्वजों
को भी
तार दिया।सीधे
हाथ में
तुलसी
चरणामृत
ग्रहण
करने से
हर शुभ
काम या
अच्छे
काम का
जल्द परिणाम
मिलता
है। इसीलिए
चरणामृत
हमेशा
सीधे हाथ से
लेना चाहिये, लेकिन
चरणामृत
लेने के
बाद अधिकतर
लोगों
की आदत
होती है
कि वे
अपना हाथ
सिर पर
फेरते
हैं।
दरअसल
शास्त्रों
के अनुसार
चरणामृत
लेकर सिर
पर हाथ
रखना अच्छा
नहीं माना
जाता है। कहते
हैं इससे
विचारों
में सकारात्मकता
नहीं बल्कि
नकारात्मकता
बढ़ती
है। इसीलिए
चरणामृत
लेकर कभी
भी सिर
पर हाथ
नहीं फेरना
चाहिए।मित्र राजीव हिदुस्तानी
के दवारा प्राप्त जानकारी जो सभी मित्रो के साथ सांझा की गई।



