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- नवरात्री से जुड़ी रावण के अंत की कथा........
Posted by : achhiduniya
12 October 2015
पौराणिक कथा अनुसार लंका युद्ध के समय भगवान श्री रामचन्द्र जी ने ब्रहमा जी से रावण से युद्ध जीतने की युक्ति पूछते है।ब्रहा जी ने रामजी से कहा कि मां चण्डी को प्रसन्न करके रावण का वध किया जा सकता है। रामजी ने मां चण्डी का पूजन व हवन करने के लिए दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी विजय व अमरता के लिए चण्डी पाठ आरम्भ किया। यह बात इन्द्रदेव ने पवन देव के माध्यम से श्री राम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि चण्डी पाठ यथा सम्भव पूर्ण होने दिया जाये। इधर रावण की माया से श्री रामजी की हवन सामग्री से एक नीलकमल गायब हो गया और रामजी का संकल्प टूटता सा नजर आने लगा।
दुर्लभ नीलकमल की तत्काल व्यस्था हो पाना सम्भव नहीं था। तभी श्री रामजी को स्मरण आया कि लोग उन्हे कमलनयन नवकंच लोचन कहते है। तो क्यों न एक सकंल्प हेतू एक नेत्र अर्पित कर दिया जाये। जैसे ही श्री राम ने अपने तीर से अपना नेत्र निकालना चाहा वैसे ही मां चण्डी प्रकट हुयी और बोली राम, मै प्रसन्न होकर तुम्हें विजय श्री का आशीर्वाद देती हूं। उधर
रावण
के चण्डी पाठ में यज्ञ कर रहें ब्राह्रणों की सेवा करने के लिए बालक का रूप धारण करके हुनमान जी सेवा करने लगे। निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्रणों ने हुनमान जी से वरदान मांगने को कहा। इस पर हनुमान जी ने विनम्रता से कहा ब्राहम्ण देवता आप जिस मन्त्र से हवन कर रहें है,
उसमें का एक अक्षर बदल दें यही मुझे वरदान दे। ब्राहमण इस रहस्य को समझ न सकें और तथास्तु कह दिया। मन्त्र में जयादेवी भर्तिहरिणी में 'ह'
के स्थान पर 'क'
का उच्चारण करें। यही मेरी कामना है।
'भर्तिहरिणी'
यानि प्राणियों की रक्षा करने वाली और इसी में “ह” की जगह “क” लगा देने से 'कारिणी'
हुआ,
जिसका अर्थ हुआ प्राणियों को पीड़ित करने वाली। बस फिर क्या था रावण की सारी तपस्या उसी वक्त निशफल हो गई,
जब उसी के प्रांगण में देवी का अपमान हुआ। देवी रुष्ट हो गईं और उसी दिन रावण का सर्वनाश करने के लिए प्रतिबद्ध हो गईं। हनुमान जी ने अपनी चुतरता से 'ह'
के स्थान पर 'क'
का ब्राहम्णों से उच्चारण करवा के रावण का सर्वनाश करवा दिया। सर्वप्रथम श्री रामचन्द्र जी ने शारदीय नवरात्रि की पूजा समुद्र किनारे तट पर प्रारम्भ कर दसवें दिन लंका पर विजय के लिए प्रस्थान करके विजय प्राप्त की थी।


