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- जिंदगी के उतार-चढाव में कामयाबी-नाकामयाबी और स्वाभिमान से जीने की कला सिखाती....महाराष्ट्र की गुड़ी
Posted by : achhiduniya
07 April 2016
नववर्ष को प्रत्येक प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना
जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह में ही नववर्ष मनाता है और इसे नवसंवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुढी पाडवा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु,
वैशाखी, कश्मीरी, नवरेह,
चेट्रीचंड, उगाडी, चित्रेय
तिरु विजा आदि सभी की तिथि इस नवसंवत्सर के आसपास आती हैं। इसी दिन से सत्युग की
शुरुआत मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु
ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बडा होने लगता है। इस
दिन आंध्र प्रदेश में घरों में पच्चडी/प्रसादम तीर्थ के रूप में बांटा जाता है। कहा
जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर
होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद होती हैं।
महाराष्ट्र में पूरण पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें जो चीजें मिलाई जाती
हैं। वे हैं- गुड,नमक, नीम के फूल,
इमली और कच्चा आम गुड मिठास के लिए, नीम के
फूल कडवाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक
होती हैं।
यूं तो आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है। किन्तु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है। महाराष्ट्र गुढी मानव देह की प्रतीक है। इस एक दिन के त्यौहार में आपको आदर्श जीवन के प्रतिबिंब नजर आते हैं। गुढी की लाठी को तेल, हल्दी लगा गर्म पानी से नहलाते है।उस पर चांदी की लोटी या तांबे का लोटा उल्टा डाल कर रेशमी जरी के वस्त्र पहनाकर फूलों और शक्कर के हार और नीम की टहनी बांधकर घर के दरवाजे पर खडी करते हैं। पोर-पोर की लाठी में रीढ की समानता नजर आती है, तो चांदी का बर्तन मस्तक का प्रतीक है। गुढी पाडवा केवल वस्त्रालंकार, गुड, धनिए, श्रीखंड-पुरी का पर्व नहीं वरन विद्या विनय की सीख देने का दिन है। तन कर खडी गुढी स्वाभिमान से जीने और जमीन पर लाठी की तरह गिरते ही साष्टांग नमस्कार कर जिंदगी के उतार-चढाव में बगैर टूटे उठने का संदेश देती है। शान से खडी गुढी कामयाबी और नाकामयाबी में भी बिना गिरे उसे हजम करना भी तो बगैर बोले ही सिखाती है।
यूं तो आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है। किन्तु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है। महाराष्ट्र गुढी मानव देह की प्रतीक है। इस एक दिन के त्यौहार में आपको आदर्श जीवन के प्रतिबिंब नजर आते हैं। गुढी की लाठी को तेल, हल्दी लगा गर्म पानी से नहलाते है।उस पर चांदी की लोटी या तांबे का लोटा उल्टा डाल कर रेशमी जरी के वस्त्र पहनाकर फूलों और शक्कर के हार और नीम की टहनी बांधकर घर के दरवाजे पर खडी करते हैं। पोर-पोर की लाठी में रीढ की समानता नजर आती है, तो चांदी का बर्तन मस्तक का प्रतीक है। गुढी पाडवा केवल वस्त्रालंकार, गुड, धनिए, श्रीखंड-पुरी का पर्व नहीं वरन विद्या विनय की सीख देने का दिन है। तन कर खडी गुढी स्वाभिमान से जीने और जमीन पर लाठी की तरह गिरते ही साष्टांग नमस्कार कर जिंदगी के उतार-चढाव में बगैर टूटे उठने का संदेश देती है। शान से खडी गुढी कामयाबी और नाकामयाबी में भी बिना गिरे उसे हजम करना भी तो बगैर बोले ही सिखाती है।

